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भारत में खरीदारी करने की वस्तुएं

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भारत में खरीदारी करने की वस्तुएं

भारत में खरीदारी करने की वस्तुएं

भारत विविधताओं का देश है। यहां हर जाति, हर धर्म के लोग एक साथ रहते है। भारत में जितने राज्य है उतनी संस्कृति, सभ्यताएं एवं उनका इतिहास है। यहां की रंग, बोली, भाषा हर कदम पर अलग-अलग है लेकिन इसके बाद भी यह एकता का संदेश देता है जो भारत की पहचान है। भारत में धर्म, इतिहास, संस्कृति, परंपरा, खाद्य पदार्थ, रोमांच, कला एवं संगीत की गहनता निहित है जिसके कारण वश है यह इन चीजों के लिए किसी सवर्ग से कम नहीं है। भारत में खरीदारी करने के लिए आपको केवल एक ही चीज पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। यहां वस्त्रों की ही इतनी किस्में है कि आप उन्हें पूरे साल भी एक-एक कर पहने तो भी कुछ ना कुछ रह ही जाएगा। भारत में खान-पान की भी कई किस्में हैं, यहां के हर राज्य का अलग खान-पान, अलग वस्त्र-परिधान एवं अलग बोली-भाषा है। यहीं कारण है कि आप भारत में आकर यहां की विविधता के कई रंग देखते हैं। भारत में खरीदारी करते समय आप हमेशा सौदेबाजी करना पसंद करते हैं क्योंकि इसका भी एक अलग ही आनंद है। यूं तो भारत में कई बाजार, कई दुकानें है जो अलग-अलग चीजों के प्रदर्शित करती हैं। भारत के हर राज्य में दुनिया भर के पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए अद्वितीय समान हैं। खरीदारी करने का असली मजा तभी आता है, जब कम से कम दाम में ज्यादा से ज्यादा चीजें मिल जायें। इसके लिये आपके लिये आप भारत के प्रत्येक शहर की विशेष परिधानों, वहां के मसालों और प्रसिद्ध चीजों की खरीदारी कर सकते हैं। यहां आप कपड़ो से लेकर फुटवियर्स, ज्वैलरी और एक्सेसरीज तक की सभी शॉपिंग एक जगह पे ही कर सकते हैं। भारत में आपको वो हर चीज मिल जाएगी जिसकी आप तलाश कर रहे हैं। इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको भारत में खरीदारी करने की कुछ विशेष वस्तुओं के बारे में बता रहे हैं जो ना केवल एक वस्तु बल्कि भारत की ऐतिहासिक संस्कृति और गरिमा का प्रतीक चिन्ह भी हैं।
नीचे कुछ चीजें दी गई हैं जिनकी आपको "भारत में खरीदारी अवश्य करनी चाहिए" ।

पारंपरिक वेशभूषा

भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जहां खान-पान, रहन-सहन, कपड़े-लत्ते और भाषा हर सौ किलोमीटर के बाद बदल जाती है। भारत के हर राज्य का अपना एक अलग पहनावा है, जो सालों-साल से चलता आ रहा है। बात उस दौर की है जब पश्चिमी पोशाकों का चलन यहां शुरू नहीं हुआ था, तब भारतीय इन पोशाकों को ही अपने शरीर का हिस्सा बनाते थे। हालांकि आज भी आपको भारत के कई हिस्सों में लोग अपनी पारंपरिक पोशाकों में दिख जाऐंगे। खासतौर पर यह दृश्य किसी उत्सव पर ही देखने को मिलता है। सांस्कृतिक विरासत के अपने महासागर के साथ, भारत विभिन्न प्रकार की पारंपरिक वेशभूषा भी प्रदान करता है। भारत में पोशाकों का संबंध मात्र शरीर को ढकने से नहीं है, बल्कि इनका संबंध भारतीय त्योहारों, परंपराओं और रीति-रिवाज़ों से भी है। यहां जिस प्रकार से धार्मिक, क्षेत्रीय और राजनीतिक विविधता है, उसी प्रकार से सभी क्षेत्रों में पोशाकों का भी अपना अलग महत्व है। जहां हिंदू महिलाएं विधवा होने पर सफेद साड़ी पहनती हैं, वहीं पारसी और ईसाई धर्म से जुड़ी महिलाएं शादी के मौके पर सफेद रंग की पोशाक पहनती हैं। यहां पोशाकें राज्य की भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करती हैं। जैसे, कश्मीर में ठंडा मौसम होने के कारण वहां के लोग 'पेहरन' पहनते हैं, जो काफी गर्म होता है। भारत में अक साड़ी को भी कई रुपों में पहना जाता है। जिनके बनारसी, कांजीवरम, तांत, चंदेरी इत्यादि कई नाम है।  साड़ियों के अलावा, सलवार कमीज, घाघरा चोली और लहंगा हैं ज्यादातर भारतीय महिलाओं द्वारा पहने जाते हैं। वहीं पुरुष धोती कुर्ता और शेरवानी पहनते हैं। इन सभी प्रकार की पोशाकों के रंग और पहनने का ढंग देख कर हम पहचान जाते हैं कि कोई व्यक्ति भारत के किस हिस्से से ताल्लुक रखता है।


कांचीवरम सिल्क साड़ी

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कांचीवरम साड़ियां भारत के दक्षिणी राज्य तमिल नाडु के कांचीपुरम शहर में बनाई जाती हैं| हिन्दू पौराणिक कथाओं केअनुसार कांजीवरम साड़ी के बुनकारों को महर्षि मार्कण्डेय  जी का वंशज माना गया हैं जो कमल के फूल के रेशों से स्वयं देवताओं के लिए बुनाई किया करते थे| यह दक्षिण भारत की सबसे प्रसिद्ध दुल्हन पहनने वाली साड़ी है। यह नाम उद्गम स्थल से लिया गया है - तमिलनाडु राज्य, भारत में कांचीपुरम साडियों के लिए प्रसिद्ध है। यह साड़ी जीवंत रंगों और उत्कृष्ट मंदिर पैटर्न सीमाओं के लिए जानी जाती है। सिल्क साड़ी का प्रमुख उत्पादन केंद्र हने के कारण कांचीपुरमको सिल्क सिटी के नाम से भी जाना जाता हैं |

ढाकई जामदानी

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ढाकई जामदानी भारत की सबसे उत्तम सूती साड़ियों में से एक है, जो बांग्लादेश के ढाका से उत्पन्न हुई है। अब यह कोलकाता में उपलब्ध है और लगभग सभी बंगाली इस के मालिक, बांग्लादेश अब कोलकाता में उपलब्ध है और लगभग सभी बंगाली इसके मालिक है। इस साड़ी इतिहास इतना पुराना है कि इसका जिक्र ईसा पूर्व के चाणक्य के द्वारा लिखे ग्रंथ अर्थशास्त्र में मिलता है। अवध के नवाबों के शासन काल में जामदानी ने कलात्मक श्रेष्ठता प्राप्त कर ली थी। हाथ से तैयार की जाने वाली जामदानी साड़ी को बनाने में कड़ी मेहनत और बहुत ज़्यादा समय लगता है। साड़ी तैयार करने के दौरान करघे पर ख़ास तरह की डिजाइन उकेरी जाती हैं जो अमूमन भूरे और सफेद रंग में होती हैं। लेकिन डाडु इसके लिए सिलिकॉन शीट का इस्तेमाल करती हैं जिनसे वो अच्छी क्वालिटी के धागे तैयार करके जामदानी साड़ी बनाती हैं। सिलिकन एक बेहद नाजुक और लचीली चीज होती है। जामदानी साड़ी को पहले सिर्फ पुरुष तैयार करते थे लेकिन अब भारत के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में महिलाएं भी इसे तैयार कर रही हैं। कई बार तो एक साड़ी को तैयार करने में दो साल तक लग जाते हैं।

पैठानी साड़ी

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पैठणी साड़ी महाराष्ट्र की प्रसिद्ध साड़ी है। पहले मराठा राजा राजवंशों के दौरान इस साड़ी में कढ़ाई के लिए असली सोने के धागे का इस्तेमाल किया गया था। रेशम से बनी हुई यह साड़ी, भारत में सबसे बहुमूल्य साड़ियों के रूप में मानी जाती है। इस साड़ी का नाम महाराष्ट्र में स्थित औरंगाबाद के पैठण नगर के नाम से रखा गया है, जहाँ इन साड़ियों को हाथों से बनाया जाता है। इसमें एक तिरछे वर्ग के डिजाइन की सीमाओं और मोर डिजाइन के साथ एक पल्लू है। सादा और स्पॉन्टेड डिज़ाइन भी उपलब्ध हैं। अन्य किस्मों में, एक रंगीन और बहुरूपदर्शक रंगीन डिजाइन भी लोकप्रिय हैं। बुनाई के समय, लंबाई के लिए एक रंग का उपयोग किया जाता है और चौड़ाई के लिए दूसरे रंग का उपयोग किया जाता है।

संबलपुरी साड़ी

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ओडिशा में, संबलपुर नामक एक छोटी सी जगह संबलपुरी साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है, जो कपास और रेशम दोनों से बनाई गई है। कॉटन और सिल्क कपड़े से बनी यें साड़ियां अक्सर महिलाएं अपने रोजाना के वस्त्रों के रुप में पलहनती है। परम्परागत एवं आधुनिक डिजाइन से निर्मित शुद्ध कॉटन और सिल्क के कपड़े की प्रिंटेड हस्तनिर्मित कामों के द्वारा इस साड़ी को तैयार किया जाता है। जिसमें अलग-अलग रंगों से डिजाइन देकर इन साड़ियों को तैयार किया जाता है। इस साड़ी की विशेषता होती है कि यें साड़ियां 5.35 मीटर लम्बी शुद्ध हस्तनिर्मित कॉटन के कपड़े से निर्मित होने के साथ किनारों पर गहरा गुलाबी रंग लिए हुए होती है। जिस पर कई तरह के फूल-पत्ती के डिजाइन बने हुए होते है।

पट्टु साड़ी

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पट्टु साड़ी सुनहरे और कभी-कभी लाल बॉर्डर वाली प्रसिद्ध सफेद साड़ी होती है जो भगवान का घर कहे जाने वाले केरल की प्रसिद्ध साड़ी है। दरअसल इन साड़ियों पर बने अलग-अलग डिजाइन हमेशा से महिलाओं को खास रुप से पसंद आएं है। केरल की विशेषताओं में से एक मलयालिस का पारंपरिक पोशाक है। सुनहरे सीमाओं के साथ ऑफ-व्हाइट रंग में गारमेंट्स, जिन्हें पट्टु के नाम से जाना जाता है, महिलाएं साड़ी नामक एक छः यार्ड ड्रिप पहनती हैं, और दोनों क्रीम और सोना होती हैं। परंपरागत रूप से, सोने की सीमाएं वास्तविक पिघला हुआ सोने में धागे को डुबोकर प्राप्त की जाती हैं।

असम सिल्क

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असम भारत में सबसे अच्छा रेशम का उत्पादन करने वाला राज्य है। यहां असम की सिल्क यानि रेशम की साड़ी बहुत प्रसिद्ध है इसे ये पारंपरिक शैली की कढ़ाई के साथ नाजुक मूंगा रेशम की साड़ी भी कहा जाता है। इन साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे बनाने के लिये जिस रेशमी कीड़ों का उपयोग किया जाता है। उसे मारा नहीं जाता,  इसलिये ये जितनी ज्यादा पुरानी होती है उतनी ही ज्यादा इनकी चमक बढ़ती जाती है। इन साड़ियों को घर पर भी आसानी के साथ धोया जा सकता है। इस साड़ी की देखरख करना बहुत जरुरी है। बता दें कि मूंगा साड़ियों को पूरा हाथा से बनाया जाता है।  इस कारण इसे बनाने में 15-45  दिन का समय लगता है। सकी और एक खासियत है कि इस पर किसी तरह की कढ़ाई आसानी से की जा सकती है।

बनारसी साड़ी

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भारत में किसी दुल्हन की शादी हो रही हो और उसके पास बनारसी साड़ी ना हो ऐसा हो ही नहीं सकता  यह वाराणसी की पारंपरिक दुल्हन साड़ी है जो लगभग हर भारतीय दुल्हन द्वारा पहनी जाती है। ज्यादातर सुनहरे बॉर्डर के साथ चमकीले रंग, बनारसी साड़ी हमेशा एक भव्य पोशाक होती है। भारतीय परंपरा में इस साड़ी का बहुत महत्व है। हाथ से बनी और कढ़ाई की हुई बनारसी साड़ी हर भारतीय महिला की पहली पसंद है । बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। बनारसी साड़ियाँ सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं। पारंपरिक हिंदू समाज में बनारसी साड़ी का महत्व चूड़ी और सिंदूर के समान है। बनारसी साड़ी का मुख्य केंद्र प्रारम्भ से ही बनारस रहा है। इसके अतिरिक्त यह साड़ी मुबारकपुर, मऊ और खैराबाद में भी बनाई जाती हैं। बनारसी साड़ियों पर ज़री का प्रयोग अधिकांत: किया जाता है, जिससे साड़ियों की सुन्दरता में वृद्धि होती है। ज़री के इस कार्य को ज़रदोज़ीकहा जाता है। ज़री सोने का पानी चढ़ा हुआ चाँदी का तार है।  बनारसी साड़ियों को किसी भी पार्टी शादी समारोह के अवसर पर इसके पहनने का अपना एक महत्व होता है। कारीगरों द्वारा बनाई जाने वाली इस साड़ी में सोने और चांदी के तारों से बनी जरी का काम किया जाता है। जिसे बनाने में 6 महीने तक का समय लग जाता है।

पोचंपल्ली साड़ी

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पोचंपल्ली साड़िया दक्षिण भारत की सबसे अच्छी साड़िया होती हैं। इन साड़ियों में मिट्टी के रंग और मीट्रिक ब्लॉक प्रिंट हैं। भारत में आंध्र प्रदेश में पोचमपल्ली साड़ियाँ प्रसिद्ध हैं। उन्हें वहां के सबसे पुराने और पारंपरिक रूपों में से एक माना जाता है ये पोचंपल्ली साड़ी काफी प्रसिद्ध हैं और उन पर किए गए ज्यामितीय पैटर्न में विशेषज्ञ हैं। इस साड़ी पर सुनहरा रंग के साथ किया गया पारंपरिक पैटर्न कुछ ऐसा है जो लोगों को इस साड़ी में देखेगा। न केवल नीचे, इस साड़ी के पल्लू को उसी प्रकार के डिजाइन से सजाया गया है। यह कहा जा सकता है कि यह विशेष सुनहरा रंग पारंपरिक डिजाइन है जो साड़ी को पहले स्थान पर इतना सुंदर बनाता है।

गोटा साड़ी

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राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध गोटा साड़ी खूबसूरत साड़ियों में से एक हैं।  ये साड़ियां महिलाओं की सादगी और खूबसूरती में चार चांद लगा देती है। इसलिए न साड़ियां की खासियत यह होती है कि इनमें गोटे को काट-काट कर पट्टियों से डिजाइन बनाई जाती है। गोटा पत्ती वर्क में आपको सिल्कख, कोटा, जॉर्जेट और शिफॉन मिल जाएगा। गोटा-पत्ती वर्क फैब्रिक को क्लासिक और डीसेंट सा लुक देते हैं। गोटा पट्टी वर्क की एक खासियत यह भी है कि यह लाइटवेट इम्ब्रायडरी हैं जो ड्रैस को हल्का-फुल्का रखता हैं। ऐसे में आप फंक्शन को कंफर्टेबली इंज्वॉय कर सकते हैं। फैशन वर्ल्डब में गोटा पत्ती वर्क को बड़े-बड़े डिजाइनर्स ने प्रमोट किया है। जयपुर में गोटा पत्ती की साड़ियां अच्छेश दामों में और कई वैराइटी में मिल जाएगी। यह साड़ियां हैवी लुक की होती हैं और त्योमहारों और मंगल कार्यो में पहनी जा सकती हैं।

चंदेरी साड़ी

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चंदेरी साड़ी मध्य प्रदेश की बहुत लोकप्रिय रेशमी साड़ी है। मध्यप्रदेश राज्य के अशोक नगर जिले में स्थित चंदेरी नामक स्थान, यहाँ की अद्भुत कशीदाकारी और सुन्दर प्रिंटेड साड़ियों के लिए विश्वभर में विख्यात है। चंदेरी का गौरवशाली इतिहास, यहाँ की कशीदाकारी की भांति ही रोमांचक और अद्भुत रहा है। चंदेरी साड़ियाँ, तीन तरह के मशहूर एवं शुद्ध फैब्रिक प्योर सिल्क, चंदेरी कॉटन और सिल्क कॉटन से निर्मित की जाती हैं। प्राचीनकाल में कपास के अत्यंत बारीक धागों से चंदेरी साड़ियों की बुनाई की जाती थी। मुगलकाल में इन साड़ियों को बुनने के लिए ढाका से बारीक मलमल के रेशे मंगवाए जाते थे। ऐसा कहा जाता है कि यह साड़ी इतनी बारीक होती थी कि एक पूरी साड़ी एक मुट्ठी के भीतर समा जाती थी। चंदेरी साड़ियों के रंग संयोजन में पृष्ठंभूमि और बॉर्डर की समरसता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इन साड़ियों में आमतौर पर केसरिया, लाल, मैरून, गुलाबी, बादामी, मोरगर्दनी और तोतापंखी रंगों का इस्तेमाल होता है। बॉर्डर और पृष्ठभूमि के लिए परस्पर विरोधी रंगों का इस्तेमाल होता है। जैसे लाल के साथ काला, सिंदूरी के साथ हरा, मेहंदी ग्रीन के साथ मैरून आदि रंगों का इस्तेमाल होता है।

बोमकाई साड़ी

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बोमकाई साड़ी ओडिशा की प्रसिद्ध साड़ी है। यह उड़ीसा के एक छोटे से गाँव बोमकै में हाथ से बुनी हुई साड़ी के रुप में प्रसिद्ध है। यह ओडिशा के बुनकरों के हाथो की कारीगरी का एक अध्भुत नमूना है। इसकी लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है, कि ऐश्वर्या राय ने अपनी शादी में इसी शैली की साड़ी पहनी थी। यह साड़ी वाकई में काफी सुंदर होती है।

तांत साड़ी

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तांत की साड़ी बंगाल की लोकप्रिय साड़ी है। मुर्शिदाबाद,नादिया, हुगली और ढाका इसके मुख्य केंद्र हैं। यह नित्य प्रयोग की जाने वाली साड़ी है।यह सस्ती साड़ियों में शुमार की जाती है। यह सूती साड़ी है।प.बंगाल की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी द्वारा इसी साड़ी को धारण किया जाता है। क्रिस्प कॉटन टैंट साड़ी बंगाल में प्रसिद्ध हैं और एक सुरुचिपूर्ण रूप देती तांत ‘ शब्द का सचमुच ‘करघा पर बना’ का अनुवाद करता है। यह बंगाल हथकरघा का गौरव माना जाता है। तांत साड़ियों सूती कपड़े से बने हैं और एक बहुत ही कुरकुरा, चिकनी खत्म कर रहे हैं और वजन में हल्का है। विभिन्न प्रकार के पैटर्न और रंगों में उपलब्ध है, आप ग्रीष्मकाल के लिए अपनी पसंद ले सकते हैं। सूती, महीन किन्तु कड़क साड़ियाँ बंगाल के बुनकरों की कला का सजीव नमूना है। पारंपरिक तौर पर यह साड़ियाँ हलके रंग में बनाई जाती हैं जिन पर गहरे चटक रंग केवल बूटी व किनार पर उपयोग किये जाते हैं। परंपरा व आधुनिकता के मिश्रण से अब रंगों व नमूनों की कोई सीमा नहीं रही। ढाका, तांगेल और मुर्शिदाबाद तांत साड़ियों के लिए प्रसिद्ध है। बंगाल में सर्वत्र उपलब्ध इन साड़ियों को अच्छे दाम व गुणवत्ता के लिए स्थानीय बाजार से खरीदें।

कोटा साड़ी

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कोटा  साड़ियाँ कपास से बनाई जाती हैं जो राजस्थान में प्रसिद्ध हैं। कोटा डोरिया साड़ी, जिसने की देश-दुनिया में कोटा का नाम सर्वोच्च स्तर पर ला दिया है, सबसे अधिक पहनी जाने वाली साड़ियों में से एक है। कोटा एवं मैसूर के संगम से बनी यह साड़ी कोटा डोरिया एवं मसूरिया साड़ी के नाम से विश्वभर में प्रचलित है। इन साड़ियों में सिल्वर, गोल्डन जरी, रेशम, सूत एवं कॉटन आदि के धागों का मिश्रण होता है। यह धागे विभिन्न प्रसिद्ध स्थानों जैसे कर्नाटक, गुजरात एवं तमिलनाडु आदि से मंगवाए जाते है। इन साड़ियों में एक विशेष प्रकार की चमक होने के कारण यह देखने में सुन्दर लगती है। इनमें की गई कलाकारियों एवं शिल्पकारियों के कारण देश-विदेशों में इनकी सराहना की जाती है। इनमें प्योर सिल्क का उपयोग किया जाने के कारण यह साड़ियाँ अत्यधिक मुलायम होती है। साथ ही साथ रेशमी होने के कारण पहनने में आरामदायक होती है।


घाघरा चोली/लंहगा

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भारत में ना केवल साड़ियो को ही परिधान के रुप में पहना जाता है बल्कि घाघरा चोली एवं लहंगे को भी विशेष रुप से पहना जाता है। राजस्थान, गुजरातच और उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध, पोशाक के रुप में इन्हें पहना जाता है। सभी सीमा कार्यों और सुनहरे मनके कढ़ाई के साथ भव्य रुप से यह सजाए जाते हैं। लहंगे को विशेष रुप से लड़किया अपनी शादी के दिन पहनती है जिनमें एक से बढ़कर एख कारीगरी की गई होती है। लहंगा, चोली और चुन्नी का या संयोजन महिलाओं की सुंदरता में चार चांद लगा देता हैं। अधिकांश उत्तर भारतीय विवाहों में, दुल्हनें लहंगा पहनना पसंद करती हैं। आप यहां रंगीन स्टोंनों की कढ़ाई वाले लंहगा भी प्राप्त कर सकती हैं। यहां लहंगे की कई किस्में हैं जो उन्हें विशेष बनाती हैं।

शेरवानी

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भारत में वस्त्रों की विविधता ना केवल महिलाओं के लिए है बल्कि भारतीय पुरुषों के लिए भी है। भारतीय पुरुष पारंपरिक पोशाक के रुप में शेरवानी या  धोती-कुर्तेको शामिल हैं। राजस्थान और उत्तर प्रदेश में प्रसिद्ध, शेरवानी रेशम से बनी होते हैं और वे एक शाही रूप देती हैं। इन शेरवानियों में जरी एवं स्टोन का काम भी किया जाता है। शेरवानी विशेष रुप से पुरुष अपनी शादी या किसी विशेष कार्यक्रम एंव समारोह में पहनते हैं।

पारंपरिक जूते

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भारत में केवल कपड़ों की ही विविधता नहीं है बल्कि पैरो में पहनने वाले जूतों में विविधता है। आप जोधपुरी या कोल्हापुरी चप्पल को कैसे भूल सकते हैं जो बहुत प्रसिद्ध है।  कोल्हापुरी चप्पल अपने हल्के वजन के लिए प्रसिद्ध हैं। जोधपुरी जूती ज्यादातर रंगीन होती हैं और एक शाही रूप देतीं हैं। आप हरिद्वार और बनारस में पाए जाने वाले खरम के रूप में लकड़ी के सैंडल की जोड़ी खरीद सकते हैं जो एक अलग रुप देती हैं।

चर्म उत्पाद

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भारत में चमड़े से बनी चीजों का भी बहुत उत्पादन किया जाता है। चमड़ा उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत सबसे बड़ा पशुधन रखने वाला देश है और 10% विश्व चमड़े की आवश्यकता का स्रोत है। चमड़े के कुछ महत्वपूर्ण उत्पादों में शामिल हैं - चमड़े के जूते, चमड़े के वस्त्र, चमड़े के सामान दोहन और गद्देदार और चमड़े के दस्ताने, बैल्ट एवं बैग सहित और यहां कई चीजें आपको चमड़े से निर्मित मिल जाएगीं। आप यहां से बहुत अच्छी क्वालिटी के लेदर जैकेट, दस्ताने, जूते और बेल्ट और बैग या फैंसी पर्स खरीद सकते हैं। राजस्थान अपने ऊंट चमड़े के उत्पादों जैसे जूते, बैग और पर्स के लिए प्रसिद्ध है।

प्राचीन आभूषण

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दिल्ली और राजस्थान में सड़क के किनारे के बाजार आपको मंत्रमुग्ध कर देते हैं। जिसका कारण है यहां सड़को किनारे बिकने वाले जंक आभूषण जो ना केवल आपको एक फंकी लूक देते हैं बल्कि आप इन्हे पहन कर पांरपरिक रुप से भी सुसज्जित होते हैं।  आपको पीतल के हार, चूड़ियाँ और पायल जैसे धातु के गहने यहां हर बाजार में मिल जाएगें। ये देखने में किसी प्राचिन गहनों की तरह लगते हैं। आपको हरिद्वार, काशी, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में इंडिया गेट के पास सड़क किनारे की दुकानों पर भी प्राचीन सिक्के भी मिल जाएगें मिलेंगे। यह सिक्के और आभूषण आपको भारत की ऐतिहासिकता से रुबरु कराएगें।

कीमती रत्न और सोना

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भारत रत्न से समृद्ध देश है। भारत में धातुओं और गहनो के रुप में सोने को सर्वप्रथम माना जाता है। इसे बहुत पंसद किया जाता है। प्राचिन भारत से ही सोने के आभूषणों के प्रति आकर्षण रहा है। । भारत को युगों से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मणि पत्थर असर क्षेत्रों में से एक के रूप में मान्यता प्राप्त है। यहां ना केवल सोना बल्कि कीमती रत्नों का भी बोलबाला रहा है। हीरे, माणिक, नीलम, पन्ना, क्राइसोबरिल और कई अन्य जैसे कीमती और पत्थरों का उत्पादन यहां होता है।  राजस्थान रत्न खरीदने के लिए एक अच्छी जगह है। आप किसी न किसी दुकान पर पॉलिश रत्न प्राप्त कर सकते हैं। आपके संग्रह में कीमती रत्न पत्थरों के साथ-साथ मीना की नक्काशी चार चांद लगा देगी। जोधपुर और जयपुर में पन्ना, रूबी, एक्वामरीन, कोरंडम, गार्नेट और नीलम बहुत प्रसिद्ध हैं।

आप चांदी के प्लेट, टंबलर और भारतीय देवताओं और देवी की मूर्तियों जैसे चांदी के लेख भी प्राप्त कर सकते हैं। चांदी के सिक्कों में देवी-देवताओं के चित्र यहां बहुत लोकप्रिय है।  सर्वश्रेष्ठ चांदी के लेख और चांदी के आभूषणों के लिए आप कटक जा सकते हैं जहां आपको अच्छी गुणवत्ता वाले चांदी के उत्पाद मिलेंगे।

भारत में खरीदारी करने की वस्तुएं

भारत में सर्वश्रेष्ठ 24 कैरेट के आभूषण भी हैं। आप अपेक्षाकृत सस्ते सोने की खरीदारी के लिए केरल जा सकते हैं। केरल में, वे सोने के गहने बनाते हैं जो बहुत भारी लग सकते हैं, लेकिन है नहीं । आप कुछ पारंपरिक सोने के आभूषण संग्रह या अंगूठी, हार और अन्य वस्तुओं के लिए सरल डिजाइन ले सकते हैं।

हस्तशिल्प और कलाकृतियाँ

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भारत के उत्तर पूर्वी भागों से बाँस के हस्तशिल्प का हमेशा निर्यात किया जाता है। सुंदर आसनों, फर्नीचर, मिट्टी के बर्तन, कपड़े, वस्त्र और घर की सजावट के लेख भारत के प्रत्येक हिस्से की कलाकृतियों को दर्शाते हैं। कुछ लोकप्रिय हैं - पश्चिम बंगाल की टेराकोटा प्रतिमाएं, कर्नाटक में मैसूर की अद्भुत चंदन की नक्काशी, मध्य प्रदेश के नक्काशीदार धातु शिल्प और जयपुर की नीली चमकती मिट्टी के बर्तन यहां बहतु प्रसिद्ध है। आप बांस और लकड़ी से हाथ से बने आभूषण भी प्राप्त कर सकते हैं। मधुबनी पेंटिंग को ले जाना मत भूलियेगा जो अपनी कला से आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। आप त्रिपुरा और असम में बांस के हस्तशिल्प प्राप्त कर सकते हैं। मधुबनी पेंटिंग बिहार और पश्चिम बंगाल में प्रसिद्ध है। हस्तशिल्प खरीदने के लिए सामान्य स्थान दिल्ली में दिली हाट, बैंगलोर में काला मध्यम, जयपुर में अनोखे ताज होटल में जा सकते हैं और इन्हें प्राप्त कर सकते हैं।

यदि आपका सामान भत्ता अनुमति देता है, तो आपको शुद्ध ऊन या रेशम से बने खूबसूरती से डिजाइन किए गए हस्तनिर्मित मूल आसनों को खरीदना चाहिए। राजस्थान में संगमरमर के लेख, पंजाब की हस्तनिर्मित कढ़ाई की चादरें और ओडिशा की रेशम चित्रों की आकर्षक तस्वीरें देखकर आप हैरान रह जाएंगे। यह कलाकृतियां आपका दिल जीत लेगीं।

पश्मीना शॉल

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पश्मीना फैब्रिक सबसे ज्यादा कश्मीर में ही बनाया जाता है। ये बहुत ही मुलायम टेक्सचर वाला कपड़ा होता है। पश्मीना शॉल हाथ और मशीन से बनाई जाती है लेकिन आपको बता दें कि बेहतर जो शॉल हाथों से बनाई जाती है वो सबसे बेहतर मानी जाती है। इस एक शॉल को बनाने में कम-से-कम तीन भेड़ों के ऊन का इस्तेमाल किया जाता है। एक पश्मीना भेड़ से करीब 80 ग्राम अच्छी ऊन मिल जाती है।

मूल कश्मीरी ऊन से बने, पश्मीना शॉल कढ़ाई के साथ तल्लीन हैं, जो आपकी अलमारी में एक शाही स्पर्श जोड़ देगा। ये शॉल भारत के कश्मीर में प्रसिद्ध हैं। आपको हाथ की कशीदाकारी पश्मीना शॉल भी मिलेगी। पश्मीना शॉल का धागा बनाने के लिए इसे ऊन को हाथों से ही चरखों की मदद से काता जाता है। ये काम काफी मुश्किल और थकाने वाला होता है। इस ऊन की कताई के लिए अनुभवी कारीगर ही मदद ली जाती है। इसके बाद इस धागे की डाई की जाती है, जिससे इसमें रंग आता है। ये भी काफी मेहनत का काम है और इसमें काफी समय लगता है। जानकारी के अनुसार भारत से कहीं ज्यादा इस शॉल की मांग विदेशों में है, इसलिए इसे नए स्टाइल में भी तैयार किया जाता है। पश्मीना कपड़ें से सिर्फ शॉल ही नहीं कुर्तियां, जैकेट्स और कपड़ें भी बनाए जाते हैं।

भारतीय चाय

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असम चाय का स्वाद और दार्जिलिंग चाय का सार विशेष रूप से यदि आप एक चाय प्रेमी हैं तो आपको इन्हें जरुर चखना चाहिए। भारत में चाय प्रेमियो की अच्छी तादाद है या यूं कहें कि चाय यहा के लोकप्रिय पेय है। भारत में चाय असम, मुन्नार और दार्जिलिगं में विशेष रुप से उत्पादित की जाती है। आप इन चायों के मूल सूखे पत्ते भी प्राप्त कर सकते हैं। आप दार्जिलिंग चाय और असम के लिए विशेष असम चाय पत्ती के लिए पश्चिम बंगाल की यात्रा कर सकते हैं। आप केरल के मुन्नार से मसाला चाय, अदरक की चाय, तुलसी की चाय, इलायची की चाय और हर्बल चाय आजमा सकते हैं। जो आपका दिल खुश कर आपको तरोताजा कर देगी।

सुगंधित उत्पाद

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भारत अपने सुंगधित उत्पादों के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। आप यहां मुख्य रुप से निशानी के रुप में चंदन की लकड़ी को रख सकते हैं। चंदन का एक टुकड़ा कई काम आता है। ना केवल सुंगंध के लिए बल्कि सुंदरता को बढ़ाने का कार्य भी करता है। आप चंदन की लकड़ी से बने हस्तशिल्प के साथ चंदन की लकड़ी का तेल, गुलाब का तेल, लैवेंडर का तेल, लौंग का तेल और जड़ी-बूटियां एकत्र कर सकते हैं। आप कुछ सुगंधित अगरबत्ती, धुप बत्तीस और सुगंधित मोमबत्तियाँ भी ले सकते हैं। आप हिरण नौसैनिक हिस्से से तैयार इत्र भी प्राप्त कर सकते हैं। यह इफ्तर के रूप में जाना जाता है और ज्यादातर मुसलमानों द्वारा उपयोग किया जाता है। आपको दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हैदराबाद, भोपाल और कोलकाता में कहीं भी इफ्तर मिलेगा।

भारत के मसाले

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भारत अपने शाही मसालो के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां मसालो की कई किस्में हैं जो कई रुपों में प्राप्त की जाती है। भारत के दक्षिणी क्षेत्र से विभिन्न प्रकार के मसाले आप प्राप्त कर सकते हैं। कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में दालचीनी, लौंग, इलायची, अजवायन के फूल और कई अन्य प्रकार के मसाले सस्ते दर पर उपलब्ध हैं। केसर को पेड़ की छाल से प्राप्त किया जाता है और यह भारत के उत्तरी हिस्सों से बहुत ही शुभ है। आप सस्ते दर पर ऊटी, मुन्नार और कूर्ग से भी मसाले प्राप्त कर सकते हैं।

आयुर्वेदिक उत्पाद

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प्राचीन इतिहास से, भारत आयुर्वेदिक संसाधनों से समृद्ध है। आप अपने दैनिक उपयोग और बेहतर स्वास्थ्य के लिए हर्बल साबुन, शैंपू, बॉडी लोशन, आयुर्वेदिक दवाएं, चवनप्राश और कई अन्य चीजें ले सकते हैं। हीना एक प्राकृतिक हेयर डाई है, और आप हिना का उपयोग करके अस्थायी टैटू भी बना सकते हैं, मेंहदी लगा सकते हैं। आपको कई जटिल बीमारियों के लिए भी हर्बल दवाएं मिलती हैं। केरल में आयुर्वेदिक उत्पाद बहुत आम हैं। आपके पास उचित मूल्य और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों और दवाओं की सूची हो सकती है। आप यहां सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

भारतीय मिठाई और सेवइयां

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भारत और मिठाइयों का बहुत गहरा नाता है। भारत के प्रत्येक राज्य के व्यंजनों का स्वाद लेने के साथ वहां की मिठाईयों का आनंद लेना ना भूलें।  आप कुछ सूखी मिठाइयाँ जैसे कि सोन पापड़ी या बेसन लड्डू पैक कर सकते हैं। आप कुछ स्नैक्स जैसे गठिया, लहसुनी सेव और भुजिया भी ले सकते हैं। कुछ प्रसिद्द व्यंजनों में राजस्थान की शान पापड़ी और मिठाइयों में घेवर और नाश्ते में गटिया और भुजिया शामिल कर सकते हैं हैं।  बंगाल का बालू और रसगुल्ला तो पूरे भारत में प्रसिद्ध है।  उत्तर प्रदेश कू जलेबी, दिल्ली का सोहन हलवा,पंजाब की पंजिरी, मथुरा के पेड़ा और तिरुपति का लड्डू आप अवश्य चखें। जो आपको यहां की मिठाइयों का दिवाना बना देगें।

भारतीय अचार

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अचार का नाम लेते ही हमारे मुंह में पानी आ जाता है। भारत में एक से बढ़कर एक अंचार बनाए जाते हैं। यह फलों एंव सब्जियों से बनाए जाते हैं जो अपने खट्टे, मीठे, चटपटे स्वाद के लिए जाने जाते हैं। अगर किसी चीज़ में दिलचस्पी है, तो आप आम या नींबू का अचार ज़रूर लें। आप मछली, बीफ़ और याक के मांस के अचार भी आज़मा सकते हैं। मांस अचार के लिए मणिपुर अच्छा है; त्रिपुरा और उत्तर कर्नाटक पोर्क अचार के लिए प्रसिद्ध हैं; मसालेदार आम के अचार के लिए आंध्र प्रदेश, मीठे आम के अचार के लिए बंगाल और मछली के अचार के लिए असम में आप जरुर जाएं।

आम

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ग्रीष्मकाल में भारत का दौरा करना और अल्फांसो आम नहीं लेना आपको जरुर निराश करेगा। भारत में आम को फलो का राजा कहा जाता है जो कई रुपों में मिलता है। भारत में आम की 100 से भी ज्यादा किस्में है प्रत्येक राज्य में आम की खास किस्में उगाई जाती है। भारत में आम की किस्मों के रुप में हैं – मालदा आम के लिए, पश्चिम बंगाल को आमों के शहर के रूप में जाना जाता है, और सबसे मीठे किस्म के हिमसागर और लंगड़ा आमों का उत्पादन होता है; उत्तर प्रदेश सफेदा, मल्लिका और रसपुरी के लिए भी प्रसिद्ध है और कर्नाटक बादामी और बागानपल्ली के लिए प्रसिद्ध है। महाराष्ट्र के रत्नागिरी के आम बहुत मीठे और रसीले होते हैं तो आप यदि भारत की यात्रा पर हो तो इन आमों का स्वाद चखना ना भूलें।

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