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भारत की प्रसिद्ध चित्रकला

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भारत की प्रसिद्ध चित्रकला


भारत की प्रसिद्ध चित्रकला

भारत में केवल मूर्तिकला ही नहीं अपितु चित्रकला ने भी कई ऐतिहासिक इमारतों को उजागर किया है। हड़प्पा, सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी चित्रकारी का वर्णन मिलता है। इसके साथ ही अजंता की दीवारों और छत ज्वलंत चित्रकला के सबसे प्रमुख उदाहरण आज भी देखे जा सकते हैं। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होता गया उसकी जीवन शैली के साथ-साथ उसका कला पक्ष भी मज़बूत होता गया। जहाँ पर एक ओर मृदभांण्ड, भवन तथा अन्य उपयोगी सामानों के निर्माण में वृद्धि हुई वहीं पर दूसरी ओर आभूषण, मूर्ति कला, मुहर निर्माण, गुफ़ा चित्रकारी आदि का भी विकास होता गया। भारत के उत्तर-पश्चिमी भाग में विकसित सैंधव सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) भारत के इतिहास के प्रारम्भिक काल में ही कला की परिपक्वता का साक्षात् प्रमाण है। खुदाई में लगभग 1,000 केन्द्रों से प्राप्त इस सभ्यता के अवशेषों में अनेक ऐसे तथ्य सामने आये हैं, जिनको देखकर बरबर ही मन यह मानने का बाध्य हो जाता है कि हमारे पूर्वज सचमुच उच्च कोटि के कलाकार थे।

भारतीय चित्रकारी के प्रारंभिक उदाहरण प्रागैतिहासिक काल के हैं, जब मानव गुफाओं की दीवारों पर चित्रकारी किया करता था। भीमबेटका की गुफाओं में की गई चित्रकारी 5500 ई.पू. से भी ज्यादा पुरानी है। 7वीं शताब्दी में अजंता और एलोरा गुफाओं की चित्रकारी भारतीय चित्रकारी का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। भारतीय चित्रकारी में भारतीय संस्कृति की भांति ही प्राचीनकाल से लेकर आज तक एक विशेष प्रकार की एकता के दर्शन होते हैं। प्राचीन व मध्यकाल के दौरान भारतीय चित्रकारी मुख्य रूप से धार्मिक भावना से प्रेरित थी, लेकिन आधुनिक काल तक आते-आते यह काफी हद तक लौकिक जीवन का निरुपण करती है। आज भारतीय चित्रकारी लोकजीवन के विषय उठाकर उन्हें मूर्त कर रही है।
भारतीय चित्रकारी को मोटे तौर पर भित्ति चित्र व लघु चित्रकारी में विभाजित किया जा सकता है। भित्ति चित्र गुफाओं की दीवारों पर की जाने वाली चित्रकारी को कहते हैं, उदाहरण के लिए अजंता की गुफाओं व एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर का नाम लिया जा सकता है। दक्षिण भारत के बादामी व सित्तानवसाल में भी भित्ति चित्रों के सुंदर उदाहरण पाये गये हैं। भारतीय चित्रकला का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। यद्यपि आधुनिक शैली की चित्रकला को अधिक पुरानी घटना नहीं माना जाता, परंतु भारत में चित्रकला के बीज तो आदिमानव ने ही डाल दिये थे। पाषाण काल में ही मानव ने गुफ़ा चित्रण करना प्रारम्भ कर दिया था, जिसके प्रमाण होशंगाबाद और भीमवेतका आदि स्थानों की कंदराओं और गुफ़ाओं में मिले हैं। इन चित्रों में शिकार, स्त्रियों तथा पशु-पक्षियों आदि के दृश्य चित्रित हैं। कालांतर में राजनीतिक कारणों से भारत की चित्रकला पर ग्रीक कला का प्रभाव पड़ा। फिर आया भारतीय संस्कृति का स्वर्ण युग। इस युग की चित्रकला की सर्वोत्तम कृतियाँ हैं- अजंता के चित्र, देवी-देवताओं की मूर्तियाँ आदि जिनको देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं। भारतीय चित्रकारी में सभ्यता के विकास के साथ परिस्थितियाँ बदलती गई। भारत धर्म और आध्यात्म की ओर आकृष्ट हुआ। यहाँ बाह्य सौंदर्य की अपेक्षा आंतरिक भावों को प्रधानता दी गई। इसलिए भारत की चित्रकला में भाव-भंगिमा, मुद्रा तथा अंगप्रत्यंगों के आकर्षण के अंदर से भावपक्ष अधिक स्पष्ट उभरकर सामने आता है।




1. अजंता गुफा चित्रकारी, औरंगाबाद, महाराष्ट्र


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अजंता गुफा चित्र प्रारंभिक मध्ययुगीन गुफा चित्रों का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करता हैं। अंजता की गुफाओं की चित्रकाकारी को महान कलाओं में से एक माना जाता है। अजंता की गुफाएँ औरंगाबाद के उत्तर में 107 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। इन गुफाओं की खोज 1819 में ब्रिटिश सेना की मद्रास रेजीमेंट के सैन्य अधिकारी द्वारा शिकार खेलते समय की गई थी। ये गुफाएँ अपनी भित्ति-चित्रकला के लिए प्रसिद्ध हैं | अजंता की गुफाएँ घोड़े की नाल के आकार की चट्टान की सतह पर खोदी गई हैं, जो बाघोरा नाम की एक संकीर्ण नदी के ऊपर लगभग 76 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैं। अजंता की गुफाओं को वर्ष 1983 में यूनेस्को ने विश्व विरासत स्थल की सूची में शामिल किया था| ये गुफाएं अलग अलग अवधियों (लगभग दूसरी सदी से लेकर छठी सदी ई। तक) में खोदी गईं।
ऐसा माना जाता है कि इन गुफाओं का निर्माण दो अलग-अलग कालों अर्थात सातवाहन और वाकाटक काल के दौरान किया गया था |अजंता की गुफाओं में बौद्ध धर्म द्वारा प्रेरित और उनकी करुणामय भावनाओं से भरी हुई शिल्पंकला और चित्रकला पाई जाती है, जो मानवीय इतिहास में कला के उत्कृेष्टफ अनमोल समय को दर्शाती है। बौद्ध तथा जैन सम्प्र दाय द्वारा बनाई गई ये गुफाएं सजावटी रूप से तराशी गई हैं। रंगों का रचनात्माक उपयोग और विचारों की स्ववतंत्रता के उपयोग से इन गुफाओं की तस्वीनरों में अजंता के अंदर जो मानव और जंतु रूप चित्रित किए गए हैं, उन्हेंत कलात्माक रचनात्मवकता का एक उच्चम स्तजर माना जा सकता है। अजंता के चित्र तकनीकी दृष्टि से पूरी दुनिया में प्रथम स्थान रखते हैं। इन गुफाओं में अनेक प्रकार के फूल-पत्तियों, वृक्षों एवं पशु आकृति से सजावट का काम तथा बुद्ध एवं बोधिसत्वोंअ की प्रतिमाओं के चित्रण का काम, जातक ग्रंथों से ली गई कहानियों का वर्णनात्मक दृश्य के रूप में प्रयोग हुआ है। ये चित्र अधिकतर जातक कथाओं को दर्शाते हैं। इन चित्रों में कहीं-कही गैर भारतीय मूल के मानव चरित्र भी दर्शाये गये हैं। अजंता की चित्रकला की एक विशेषता यह है कि इन चित्रों में दृश्यों को अलग-अलग भागों में नहीं विभाजित किया गया है। अजंता की प्रसिद्ध गुफाओं के चित्रों की चमक हज़ार से अधिक वर्ष बीतने के बाद भी आधुनिक समय से विद्वानों के लिए आश्चर्य का विषय है। भगवान बुद्ध से संबंधित घटनाओं को इन चित्रों में अभिव्यक्त किया गया है।



2. बाघ गुफा चित्रकारी, मध्य प्रदेश


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बाघ की गुफ़ाएं मध्य प्रदेश में इन्दौर के पास धार में स्थित हैं। मध्य प्रदेश के बाग शहर में मानव निर्मित रॉक-कट गुफाओं में कला-कार्यों की एक और अद्भुत श्रृंखला मिली है। अजंता चित्रों की तरह, बाग स्मारकों में खूबसूरत भित्तिचित्र बौद्ध धर्म से स्पष्ट रूप से प्रेरित हैं। ये गुफा शायद बौद्ध विहार (मठ) थे जिनकी संख्या नौ हैं। लेकिन उनमें से केवल पांच ही गुफाएं बची है।  सकते हैं। बाघ गुफाएं, नौ स्मा।रकों का एक समूह है जिन्हेब चट्टानों को काटकर बनाया गया है। यह गुफा, भित्ति चित्रों के लिए खासी प्रसिद्ध है, धार की गुफा पूरे भारत में चट्टान में की गई खुदाई का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसे वास्तु्कला का अद्भूत नमूना माना जाता है।

बाघ की गुफाओं के चित्रों में मुख्य रूप से लौकिक और धार्मिक जीवन से संबंधित प्रसंगों को चित्रांकित किया गया था। गुफा की दीवार, छत और स्तंभों पर बड़ी संख्या में भित्तिचित्र बने थे। इनमें कमोबेश सभी हल्के रंगों का प्रयोग किया गया। मुख्य रूप से नीले, पीले, काले एवं लाल रंगों का उपयोग देखने को मिलता है। सभी रंग वानस्पतिक या पत्थरों को पीसकर बनाए गए हैं। गुफा की छत पर हाथी, भैंस, पक्षी, फल-फूलों को चित्रित किया गया। सम्मान देने की मुद्रा में नर-नारी के चित्र हैं। गुफा के अंत में बुद्ध और उनके शिष्यों के चित्र थे। हालांकि इन चित्रों को काफी नुकसान हो चुका है। गुफा क्रमांक 2 जिसे रंग महल के नाम से भी जाना जाता है, में सुंदर बेल-बूटे वाले चित्र हुआ करते थे। इसमें दो मीटर ऊंचे स्थान में नृत्य करते हुए घोड़ों तथा हाथियों की शोभायात्रा के दृश्यों को चित्रित किया गया था। इसमें एक अन्य चित्र महत्वपूर्ण है। इसमें महिला को विलाप करते हुए तथा दूसरी महिला को सांत्वना देते हुए अंकित किया गया था। ऐसे कई महत्वपूर्ण दृश्य यहां अंकित किए गए थे लेकिन ये दुर्लभ चित्र अब आसानी से देखे नहीं जा सकते हैं। कुछ को सुरक्षित-संरक्षित कर लिया गया लेकिन कुछ नष्ट हो गए हैं। 1982 से इन चित्रों को दीवारों व छतों से निकालने का कार्य शुरू हुआ। नमी से प्रभावित इन चित्रों को तेज धार वाले औजारों से काटकर दीवारों से अलग किया गया। चित्रों को वापस मूल स्वरूप में लाने के लिए उनकी रासायनिक पदार्थों से फैंसिंग की गई। निकाले गए चित्रों को मजबूती देने के उद्देश्य से फाइबर ग्लास एवं अन्य पदार्थों से माउंटिंग की गई है।




3. राजा रवि वर्मा द्वारा जटायु वधनम पेंटिग्स



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भारतीय चित्रकारी के प्रमुख राजा रवि वर्मा यदि नहीं होते तो हम अपने देवी-देवताओं को चित्रित रुप में नहीं देख पाते। सभी देवी-देवताओं और उनसे जुड़ी घटनाओं को चित्रित करने का श्रेय राजा रवि वर्मा को ही जाता है। 20वी सदी में केवल राजा रवि वर्मा ही एकमात्र ऐसे भारतीय चित्रकार थे जिनको आयल पेंटिंग आती थी | उन आयल पेंटिंग से उन्होंने भारतीय देवी देवताओ को उभारा जो एकदम सजीव लगे जिसे भारतीय हिन्दू अपने घरो में देवताओ की तरह पूजने लगे | इससे पहले केवल मूर्तियों का प्रचलन था और मन्दिर जाना पड़ता था लेकिन राजा रवि वर्मा की चित्रों की बदौलत ईश्वर घर-घर तक पहुंचे थे। भारत में उस वक्त ऑयल पेंटिंग एक नई विधा थी। राजा रवि वर्मा ने नेदरलैंड्स के मशहूर चित्रकार थियोडोर जेनसन से ऑयल पेंटिंग्स की कला को सीख कर उसे भारत में मशहूर किया।

ऐसा कहा जाता है कि भारतीय पौराणिक कथाओं को आधुनिक युग के महानतम भारतीय कलाकार राजा रवि वर्मा ने चित्रों के साथ जीवन में लाया था। उनके द्वारा दिव्य चित्रण ज्यादातर भारतीय पौराणिक कथाओं और केरल और महाराष्ट्र की संस्कृति पर आधारित थे। राजा रवि वर्मा की इस पेंटिंग में रावण के सीता हरण के वक्त जटायू के संघर्ष को दिखाया गया है। जटायू ने सीता को बचाने के लिए अपने प्राण न्योछावर किए थे। वर्मा ने इस पेंटिंग में वो प्रकरण बखूबी दिखाया है।  अनगिनत आश्चर्यजनक चित्रों में से, जटायु वाधनम एक अलग चित्र था।  रावण के साथ जटायु का युद्ध दृश्य और विलाप करती सीता के दुःख, रावण की क्रूरता और जटायु की रावण के साथ युद्ध की बहादुरी को आश्चर्यजनक सटीकता और लचीलेपन के साथ चित्रित किया गया था। जिसे देखकर उस समय की दुख और पक्षी की बहादूरी समझ आती है।



4. अवनींद्रनाथ टैगोर द्वारा भारत माता की चित्रकारी


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अवनींद्रनाथ टैगोर ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ़ ओरिएण्टल आर्ट’ के मुख्य चित्रकार और संस्थापक थे। भारतीय कला में स्वदेशी मूल्यों के वे पहले सबसे बड़े समर्थक थे। इस प्रकार उन्होंने ‘बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट’ की स्थापना में अति प्रभावशाली भूमिका निभाई, जिससे आधुनिक भारतीय चित्रकारी का विकास हुआ। भारतमाता नामक चित्र का रचना सन 1905 में भारत के प्रसिद्ध चित्रकार अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने किया था भारत माता'  एक भगवा पहने हुए महिला को दर्शाती हैं, जिसमें एक किताब,  सफेद  कपड़ा और उसके चारो हाथों में एक माला है। इस चित्र का भारतीय चित्रकला में ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि यह भारत माता, या "मदर इंडिया" के शुरुआती दृश्यों में से एक है।
भारतीय कला में स्वदेशी विचारधाराओं की वकालत करने के पहले उदाहरण के रूप में अबिन्द्रनाथ टैगोर को माना जाता है। उन्होंने अपने चित्र के माध्यम से भारत माता की एक व्यापक छवि समाज के सामने प्रस्तुत की थी।



5. अमृता शेर-गिल द्वारा तीन लड़कियों का समूह


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अमृता शेर-गिल ख़ूबसूरत चित्रकारी करने वाले चित्रकारों में से एक थीं। अमृता शेरगिल ने कैनवास पर भारत की एक नई तस्वीर उकेरी। अमृता ने इस प्रकार के यथार्थवादी चित्रों की रचना की थी, जिनकी सारे संसार में चर्चा हुई। अमृता की तीन लड़कियों वाली तस्वीर बहुत प्रचलित हुई थी। ग्रुप ऑफ़ गेट गर्ल्स शायद सबसे महान भारतीय कलाकारों में से एक अमृता शेर-गिल द्वारा सबसे अच्छी पेंटिंग है और जिसे भारत के फ्रिदा काहलो भी कहा जाता है। तीन लड़कियां एक चित्रकारी है जिसमें तीन गांव लड़कियों ने रंगीन ढंग से एक नियति के बारे में सोचने के बारे में सोचते हुए चित्रित किया है, जिसे वे कभी नहीं बदल सकते हैं। वंचित अभी तक उत्साहित लड़कियों के यथार्थवादी चेहरे की अभिव्यक्ति ने चित्रकला को इतनी अनूठा रूप से सुंदर बना दिया। चित्रकला महान फ्रांसीसी चित्रकार पॉल गौगुइन के झुंडों से प्रभावित थी।

तीन लड़कियां’ शीर्षक के इस चित्र में तीन युवतियों को एक साथ बैठे हुए दर्शाया गया है। लेकिन एक साथ होते हुए भी अमृता शेरगिल ने उन्हें तीन स्वतंत्र लड़कियों के रूप में दिखाया है। उनके वस्त्रों के रंग तो भिन्न हैं ही, साथ ही उनके चेहरों के रंग भी भिन्न हैं। इन तीनों में कोई भी गोरी तो नहीं है, वे एक समान सांवली भी नहीं हैं। तीनों लड़कियों के चेहरों पर कोई स्पष्ट भाव नहीं दिखता और तीनों ही अपने-आप में इस हद तक खोयी लगती हैं कि मानो उनके पास बोलने के लिए कुछ भी नहीं है। इन सब के साथ वे तीनों कुछ असहज सी मुद्रा में चित्रकार से मुंह फेरे बैठी सी दिखती हैं। इस चित्रकारी में तीनों लड़कियों के वस्त्र भी अलग है जो शायद अलग-अलग समुदायों का वर्णन करते हैं।  अपनी चित्रकारी के बारे में अमृता का कहना था- 'मैंने भारत की आत्मा को एक नया रूप दिया है। यह परिवर्तन सिर्फ विषय का नहीं, बल्कि तकनीकी भी है।' अमृता शेरगिल के चित्रों में विदेशी चित्रकला के प्रभावों को लेकर कई सवाल उठते रहे हैं, पर वास्तव में इस चित्र के तीन बेबस और लगभग बेजुबान भारतीय लड़कियों की विशिष्टता ही अमृता शेरगिल के चित्रों की ‘भारतीयता’ है, जिसकी कल्पना उनके पहले किसी भारतीय चित्रकार ने नहीं की थी।



6.नंदलाल बोस द्वारा बापूजी की चित्रकारी


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नंदलाल बोस एक प्रसिद्ध भारतीय चित्रकार थे। इन्हें आधुनिक भारतीय कला के आरंभिक कलाकारों में से एक माना जाता है। ये अवनीन्द्रनाथ टैगोर के प्रख्यात शिष्य थे और इन्हें चित्रकारी की ‘भारतीय शैली’ के लिए जाना जाता है।  नंदलाल बोस कहा करते थे, कि बापू सभी कलाकारों के लिए एक प्रेरणा थे। उन्होंने गांधी को आदर्श मानते हुए उनकी यात्रा की चित्रकारी की थी। 'दांडी मार्च'  नामक यह  चित्र 1930 में बनाया गया था। यह तस्वीर दिल्ली में "नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट" में स्थायी रूप से प्रदर्शन पर है। वर्ष 1930 में बनाई गई यह पेंटिंग आज दिल्ली में स्थित “नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट” का हिस्सा है। इस पेंटिंग को नंद लाल बोस ने बनाया है। गाँधी ने गुलामी के दिनों में अंग्रेजों के खिलाफ दांडी मार्च निकालकर विरोध प्रदर्शन किया था।1930 के प्रसिद्ध दांडी मार्च की शुरूआत और महात्मा गांधी की अगुवाई शुरु किया गया था जिसे चित्रकार ने काले और सफेद रंग में चित्रित किया है। यह छवि आधुनिक भारतीय कला का एक अद्भुत उदाहरण है।



7. जहांगीर सबवाला द्वारा स्टार द बेकन की चित्रकारी


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जहाँगीर सबावाला का जन्म मुंबई में 1922 में हुआ और विश्व के सर्वाधिक प्रसिद्ध कला विद्यालयों में उनकी शिक्षा हुयी।  जहांगीर सबावाला भारत के महान चित्रकार माने जाते हैं। भारतीय आधुनिक चित्रकला जगत के प्रणेताओ मे से एक थे। अपने जीवनकाल के लगभग 60 वर्ष इन्होने इस कला को समर्पित कर दिया स्टार द बेकन 'सज्जन पेंटर'  जहांगीर सबवाला द्वारा सर्वश्रेष्ठ आधुनिक भारतीय कला-कार्यों में से एक का सबसे अच्छा काम था। पेंटिंग रेत, समुद्र और उड़ने वाले पक्षियों के सुंदर मिश्रण के साथ आकाश विलय के एक आश्चर्यजनक मिश्रण है।



8. एमएफ हुसैन द्वारा मदर टेरेसा की चित्रकारी


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मकबूल फिदा हुसैन (एम एफ हुसैन) देश के सबसे महान और सबसे विवादित चित्रकारों में से एक हैं। उनका जन्म 17 सितंबर 1915 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। हुसैन की पेंटिग्स के लोग दीवाने थे, फिर भी उनकी बनाई पेंटिंग्स अक्सर लोगों को समझ नहीं आती थी। लेकिन उनके द्वारा बनाई गई खास चित्रकारी में से मदर टेरिसा की चित्रकारी जो समाज सेविक के रुप में आज भी विख्यात है थीं।  विश्व भर में मदर टेरेसा के नाम से प्रसिद्ध इन महिला की यह पेंटिंग भारत के मशहूर चित्रकार एम।एफ। हुसैन ने बनायी है। जैसा कि आप देख सकते हैं कि इस तस्वीर में मदर टेरेसा ने सफेद रंग की साड़ी पहन रखी है जिसमें नीले रंग की पट्टी है। एम। एफ। हुसैन के द्वारा बनी यह पेंटिंग आज भारत के सबसे मशहूर पेंटिंगों में से एक थे।

पौराणिक चित्रकार एमएफ हुसैन द्वारा मदर टेरेसा अमूर्त आधुनिक कला और एक बेहद समझदार काम करने का एक विशेष जरिया थीं। एमएफ हुसैन ने उनकी चित्रकारी कर चित्रों के साथ एक पूर्ण न्याय किया, जिससे उनकी क प्रतिष्ठित, अत्यधिक प्रशंसनीय सराहना की गई।



9. एम एफ हुसैन द्वारा सरपट दौड़ते घोड़े की चित्रकारी


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विवादित और महान चित्रकार एमएफ हुसैन का सबसे पसंदीदा विषय घोड़ा था जिसे उन्होंने कई बार अपने चित्रों में जगह दी थी। 'सरपट दौड़ते हुए घोड़े की यह चित्रकारी उनके कुछ महान चित्रों में से एक थी। साथ ही यह आधुनिक भारतीय चित्रकारों द्वारा किए गए सबसे अच्छे कामों में से एक था। यह खूबसूरत छवि अभी भी देश की सबसे पुरानी संपत्तियों में से एक है।



10. निकोलस रोरीच द्वारा कृष्णा की कुल्लू में वसंत की चित्रकारी


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कृष्णा, निकोलस रोरीच यद्यपि जीवनभर एक रूसी नागरिक बने रहे, लेकिन कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि उन्होंने हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में अपने जीवन के आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण वर्षों में कितना कीमती वक्त बिताया था।उन्होंने कुल्लू में वंसत की चित्रकारी कर भारतीय चित्रकारी को एक नया आयम दिया। कुल्लू में वसंत वास्तव में भारतीय मिट्टी में बने सबसे महान कला-कामों में से एक था। इस चित्रकारी में भगवान कृष्णा को हिमालय से घिरे हुए आकर्षक बर्फबारी के बीच बर्फ से ढके पेड़ों के नीचे हमेशा की तरह बांसुरी बजाते हुए दिखाया गया था। जो उनकी इसे सबसे खूबसूरत पेंटिग बनाती है। यह छवि अब निकोलस रोरीच संग्रहालय, न्यूयॉर्क में स्थायी प्रदर्शनी के लिए रखी गई है।



11. रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा आयरलैंड से मलांगगन मुखौटा


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रवींद्रनाथ टैगोर सिर्फ एक कवि, गीत-लेखक, कहानी लेखक, उपन्यासकार, नाटककार या महान दार्शनिक नहीं थे बल्कि उनके पास एक कलाकार के रूप में चित्रकारी भी प्रसिद्ध कला के रुप में स्थित थी। साठ वर्ष की उम्र में शुरु हुई उनकी चित्रकारी की कला ने उनके जीवन के कुछ महान चित्रों को अंकित कर दिया। आयरलैंड से मलांगगन मास्क शायद उनमें से सबसे अच्छा चित्रकारी का उदाहरण है। इस लोकप्रिय मुखौटा की उनकी प्रस्तुति पेस्टल पर की गई थी। जो उनकी कला का एक बेहद प्रशंसित टुकड़ा था।



12. जामिनी रॉय द्वारा गोपीनी की चित्रकारी


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जामिनी रॉय भारत के महान चित्रकारों में से एक थे। उन्हें 20वीं शताब्दी के महत्वीपूर्ण आधुनिकतावादी कलाकारों में एक माना जाता है। जिन्होंोने अपने समय की कला परम्प्राओं से अलग एक नई शैली स्था पित करने में अहम् भूमिका निभाई। वे महान चित्रकार अबनिन्द्रनाथ टैगोर के सबसे प्रसिद्ध शिष्यों में एक थे। उन्होंने एक बड़ा दिलचस्प और साहसिक प्रयोग भी किया था – ईसा मसीह के जीवन से जुड़ी घटनाओं के चित्रों की श्रृंखला। उन्होंने इसमें ईसाई धर्म की पौराणिकता से जुड़ी कहानियों को इस तरह से प्रस्तु।त किया कि वह साधारण ग्रामीण व्यडक्ति को भी आसानी से समझ में आ सकती थी। उनकी कला की प्रदर्शनी पहली बार सन् 1938 में कोलकाता के ‘ब्रिटिश इंडिया स्ट्रीट’ पर लगायी गयी। 1940 के दशक में वे बंगाली मध्यम वर्ग और यूरोपिय समुदाय में बहुत मशहूर हो गए। उनकी कई कृतियां निजी और सार्वजनिक संग्रहण जैसे विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम लन्दन में भी देखी जा सकती हैं।

उनकी कालकृतियों में गोपीनी सबसे प्रसिद्ध और प्रशंसित चित्रकारी थी। जिसमें एक खूबसूरत जवान औरत मुद्रा में एक गीतात्मक कामुकता और चमक लिए बैठी है। रेखाओं की सुस्पष्ट बारीकियां रॉय की सधी कूची की कहानी कहती है। सुरीली दिखती ये रेखाएं अक्सर कामुक भी दिखती हैं। सफेद या पीली-भूरी पृष्ठभूमि पर कालिख से चित्रकारी न केवल उनमें बल्कि मानव स्वरूप में छिपी लयात्मकता को भी प्रस्तुत करा है। बाउल एवं बैठी हुई महिला इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। राय ने लोकोक्तियों के समुचित उपयोग में एक पूर्व शिक्षित कलाकार की संवेदना भर दी। अपने चित्रों में वे सौम्यता से विमुख नहीं हुए। इतना ही नहीं अपने चित्र में जो भव्यता वो लाते हैं उससे प्राचीन मूर्तियों की गुणवत्ता बरवस याद आती है। उनकी यह कला-कार्य कोलकाता के कालीघाट पटचित्र से प्रभावित था। गोपीनी अब नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, नई दिल्ली में स्थित है।



13. तैयब मेहता द्वारा महिषासुर की चित्रकारी


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1994 में भारतीय चित्रकार तैयब मेहता की बनाई पेंटिंग”महिषासुर” सबसे प्रचिलित चित्रकारी थी। पौराणिक कथाओं में वर्णित महिषासुर एख दानव था जिसका अंत मां दुर्गा ने किया था। महिषासुर की चित्रकारी शायद भारत के सबसे प्रभावशाली समकालीन कलाकारों में से एक, तैयब मेहता द्वारा सबसे प्रसिद्ध कला-कार्यों में से एक है। भारतीय पौराणिक तत्वों को हमेशा मेहता के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान मिलते हैं। महिषासुर देवी काली द्वारा दानव की हत्या का चित्रण करते हुए दर्शाना एक अद्भुद कलाकारी है। उनकी इस चित्रकारी को 2013 में 19 करोड़ 7 लाख रूपए में खरीदा गया था। उससे पहले ये साल 2008 में 8 करोड़ रूपयों में बिकी थी।

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