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भारत के ऑफबीट गंतव्य

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भारत के ऑफबीट गंतव्य

भारत विविधताओं का देश है। भारत का हर राज्य, हर शहर, हर क्षेत्र अपने आप में बहुत खास है। यहां की चारों दिशाओं में पर्यटकों के लिए एक से बढ़कर एक पर्यटन स्थल है जो किसी भी पर्यटक को चाहें वो देशी हो या विदेशी निराश नहीं करेंगें। भारत पर्यटन की दृष्टि से एक संपूर्ण देश है। इसके उतर में कश्मीर, उतराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसी ठंडी वादियां है तो वहीं देश की राजधानी दिल्ली में ऐतिहासिक संस्कृति के चिन्ह विद्यमान है। पूर्व में पश्चिम बंगाल, बिहार जैसे राज्यों में ऐतिहासिक और सांस्कृति पृष्ठभूमियां विद्यमान है तो पश्चिम में राजस्थान, गुजरात के चमकते रेगिस्तान इसकी शान है। मध्य में महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, जैसे राज्यों में कलाओं का सम्मेलन है तो दक्षिण राज्यों में केरल, कर्नाटक इत्यादि के तटीय क्षेत्र किसी का भी मन मोह लेने का दम रखते हैं। गोवा की खूबसूरती देखने जहां देश-विदेश से पर्यटक आते हैं वहीं शांति का एहसास करने के लिए धार्मिक स्थानों पर पर्यटक जाते हैं। भारत में कई ऐसी प्रसिद्ध जगह है जिनके बारे में आपने सुना ही होगा। लेकिन भारत में कुछ ऐसी भी जगह जिनकी चर्चाएं कम होती है पर्यटकों को इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है किन्तु यह स्थान एक क्षण में दिल जीतने का दम रखते हैं। शहरों के शोर-शराबे से दूर भारत में कई ऐसी जगह हैं जहां आपको एक अनुपम शांति का एहसास होगा।

भारत के ऑफबीट गंतव्य

इन कम प्रसिद्ध जगहों को आप ऑफबीट गंतव्यों के रुप में जानते हैं। कई पर्यटक अक्सर उन जगहों पर जाने से कतराते हैं जहां वो कई बार हो आए हैं और बार-बार जाकर थक गए है। यह ऑफबीट गंतव्य उन पर्यटकों को खास पंसद आएंगें, जो कुछ नया देखना चाहते हैं कुछ नया अनुभव करना चाहते हैं। यह ऑफबीट गंतव्यों की सुंदरता ही है कि वो कम ज्ञात और बड़े पैमाने पर अनदेखे रहते हैं। ऑफबीट गंतव्यों उन पर्यटकों के लिए आदर्श हैं जो परंपरागत पर्यटक स्थलों से ऊब गए और थके हुए हैं और एक नए अनुभव वाले स्थानों की तलाश में हैं।

यह एक अचूक तथ्य है कि भारत एक ऐसी भूमि है जो पर्यटन के लिए विविध विकल्पों को प्रस्तुत करती है। अपने रेतीले समुद्र तटों, ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों, उदार वर्षा वनों, उग्र पहाड़ी स्टेशनों, लुभावने झरने, शानदार पर्वत श्रृंखलाएं, चमकते रेगिस्तान,  वन्यजीव अभ्यारण्य  इत्यादि के साथ भारत में सब कुछ है। भारत अपने विविध पर्यटन पृष्ठभूमि के लिए दुनिया भर के आगंतुकों के लिए एक अंतिम आकर्षण बन गया है। वैसे तो भारत में बहुत ही खूबसूरत जगहें है जिन्हें देखने के लिए भारत के बाहर से लोग आते है। लेकिन इसके साथ ही भारत में अभी भी कई स्थान ऐसे है जिनके बारे में बहुत ही कम लोग जानते है। ये स्थान वाकई काफी खूबसूरत है, जहां आपको अपने जीवन में एक बार जरूर जाना चाहिए।

भारत बहुत सारे ऑफबीट गंतव्यों का घर है ऑफबीट अभी तक भारत में आने वाले गंतव्यों को ऐसे स्थान हैं जो सबसे लोकप्रिय स्थलों की सूची में नहीं आते। लेकिन फिर भी यह उन लोगों के लिए एक असाधारण अनुभव प्रदान करने का आश्वासन देते हैं जिन्हें कुछ अलग देखने की इच्छा है – तो आइए भारत में कुछ शीर्ष ऑफबीट गंतव्यों के बारे में हम आपको बताते है जिनके बारे में आपने बहुत कम सुना होगा किन्तु जब आप यहां जाएगें तो यहां के रंग में रंग जाएगें।

चोपता - भारत का छोटा स्विट्ज़रलैंड

भारत के ऑफबीट गंतव्य

यदि आप उत्तराखंड में एक पहाड़ी स्थल की तलाश में हैं जो पूरी तरह से शुद्ध पहाडी स्थल हो तो चोपता आपके पैमानों पर एकदम खरा उतरेगी। चोपता को छोटा स्विट्ज़रलैंड भी कहा जाता है। चोपता ऐसा अनछुआ और अनजान हिल स्टेशन है जिसकी प्राकृतिक खूबसूरती और हरियाली आपको अंदर तक आनंदित कर देगी। चोपता उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग ज़िले में उखीमठ से 37 किलोमीटर दूर समुद्र की सतह से 9515 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यह पहाड़ी स्थान एक ऐसी खूबसूरत जगह है, जहाँ पहुँच कर मन को शांति और विश्राम मिलता है। कम भीड़-भाड़ पसंद करने वालों के लिए चोपता किसी जन्नत से कम नहीं। यहाँ का प्राचीन पर्यावरण ट्रेकर्स और पर्यटकों दोनों को ही एक अलग और सुखद अनुभव का एहसास करता है। यहाँ का चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला ट्रेक मार्ग, काफी लोकप्रिय है। यहाँ की नम हवा में बसी और दरख्तों से लिपटी सौंधी-सी खुशबू आपके तन-मन को तरोताजा कर देंगी। यहाँ पहुँच आपकी आत्मा उत्साह और संतुष्टि से भर जाएगी। यहाँ के पर्वतों में अलग ही जादू है। यहाँ हर दम चलती ठंडी-ठंडी हवाएं, मिटटी की वह मनमोहक खुशबु,घने जंगल आपको दूसरी ही दुनिया में ले जायेंगे। यह उत्तर भारत में सबसे उत्तम, गैर वाणिज्यिक पहाड़ी स्टेशनों में से एक है। सुरम्य पहाड़ी स्टेशन मोटी वुडलैंड्स से घिरे हुएं है। पहाड़ों और उदार ग्रीनियों के बर्फ से ढकी हिमालयी श्रृंखलाओं का लुभावना दृश्य आपको झकझोर देगा।

चोपता शानदार प्राकृतिक स्थान वनस्पतियों और जीवों की एक विस्तृत श्रृंखला का घर है, जिसमें पाइन पेड़, रोडोडेंड्रॉन (रोडोडेंड्रॉन फेरुगिनियम) और देवदार पेड़ (हिमालयी देवदार) का एक बड़ा भंडार है। यहां अद्भुत पहाड़ी स्थलों को देखने का अनुपम नजारा मिलता है। इस खूबसूरत स्थल से हिमालय की नंदादेवी, त्रिशूल एवं चौखम्बा पर्वत श्रृंखला के विहंगम दृश्य दिखते हैं। जब सूर्य की किरणें हिमालय की चोटियों पर पड़ती हैं तो यहाँ की सुबह काफ़ी मनोरम लगती है। यहां पर 'केदारनाथ वाइल्ड लाइफ सेंचुरी', तुंगनाथ, चंद्रशिला और देवहरिया ताल आदि प्रमुख पर्यटक स्थान हैं। कुल मिलाकर, चोपड़ा पहाड़ी स्टेशन प्रेमियों और  साहसिक पर्यटकों के लिए उनके परिवार और दोस्तों के साथ शांतिपूर्ण अवकाश के लिए एक आदर्श स्थान है जहां आप आकर शहर के प्रदूषण से मुक्त सुकुन की सांस ले सकेंगे।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: अप्रैल से जून और सितंबर से नवंबर तक का है

चीजें करने के लिए: ट्रेकिंग, स्नो स्कीइंग, कैम्पिंग, रॉक क्लाइंबिंग, रैपलिंग इत्यादि


लोकताक झील - तैरती हुई झील

भारत के ऑफबीट गंतव्य

मणिपुर के खूबसूरत राज्य में मोइरंग के छोटे शहर के पास स्थित, लोकतक झील उत्तर-पूर्वी भारत में सबसे बड़ी ताजे पानी की झील है। इस झील को फ़्लोटिंग द्वीपों की श्रृंखला के लिए जाना जाता है, जिसे व्यापक रूप से 'फुमडीस' कहा जाता है। लोकताक झील भारत के पूर्वोत्तर भाग में स्थित मणिपुर राज्य की एक मात्र ऐसी झील है, जिसे तैरती हुई झील कहा जाता है। इस झील में घनी जलीय घास के बड़े-बड़े हिस्से तैरते रहते हैं और इन्हीं तैरती वनस्पतियों के कारण लोकताक झील को तैरती झील कहा जाता है। यह अपनी सतह पर तैरते हुए वनस्पति और मिट्टी से बने द्वीपों के लिये प्रसिद्ध है, जिन्हें फुमदी कहा जाता है। यह झील मणिपुर में खूगा नदी के पास स्थित है। लोकताक झील देखने में बहुत ख़ूबसूरत है। यह झील यात्रियों को आकर्षक और सुंदर परिवेश और इसकी विभिन्न छोटी पहाड़ियों और आइलेट्स का अनुभव करने के लिए विशाल अवसर प्रदान करती है जो पैटर्न के विपरीत फमडीस के साथ बिखरे हुए हैं। लोकतक झील के विभिन्न द्वीपों में से, फुबाला और सैंड्रा सबसे महत्वपूर्ण हैं। वे यात्रियों को सुविधाओं की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान करते हैं। सैंड्रा द्वीप के ऊपर स्थित आवास से, झील का वातावरण एक मनोरम दृश्य दिखलाता है।

लोकताक झील मणिपुर के लिये बहुत आर्थिक व सांस्कृतिक महत्व रखती है। इसका जल विद्युत उत्पादन, पीने और सिंचाई के लिये प्रयोग होता है। इसमें मछलियां भी पकड़ी जाती हैं। यह पूर्वोत्तर भारत की ताजे पानी की सबसे बड़ी झील है। चारों ओर से छोटी-छोटी नदियां अपना पानी लोकताक झील में गिराती हैं। फुमदी का उपयोग स्थानीय लोग मछली पकड़ने, अपनी झोपड़ी बनाने और अन्य उपयोग के लिए करते हैं। केबुल लैमजाओ नेशनल पार्क, दुनिया का एकमात्र फ़्लोटिंग पार्क, लोकताक झील का एक अभिन्न हिस्सा है। लोकतक झील जैव विविधता से भी परिपूर्ण है। इसमें पानी के पौधों की तकरीबन 233 प्रजातियां, पक्षियों की 100 से अधिक प्रजातियां रहती हैं। इसके अलावा जानवरों के 425 प्रजातियां भी हैं, जिनमें भारतीय पाइथन, सांभर और दुर्लभ सूची में दर्ज भौंकने वाले हिरण भी हैं। पर्यटन के लिहाज से झील अनोखी जगह है, जिसमें पर्यटक अलग अलग आकार के फुमदी की सुंदरता देख सकते हैं। यहां ठहरने के लिए इस झील की एक बड़ी फुमदी में सेंड्रा टूरिस्ट होम भी मौजूद है। इस झील को धेकने का समय सुबह 6 बजे से 10 बजे तक है और शाम को 3.30 बजे से 6 बजे तक यहां आया जा सकता है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: नवंबर से मार्च तक का है


शेखावाटी - राजस्थान की ओपन आर्ट गैलरी

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यदि आप इतिहास एवं वास्तुकला में रुचि रखते हैं। तो भारत के पश्चिमी राज्य राजस्थान का शेखावाटी आपकी इस रुचि को संपूर्ण करने का दम रखता हैं राजस्थान में स्थित शेखावाटी ऐतिहासिक क्षेत्र हैं। शेखावाटी एक ऐसी जगह है जो आपकी यात्रा में सूचीबद्ध है। राजस्थान के पूर्वोत्तर भाग में स्थित, शेखावाटी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। इस ऐतिहासिक क्षेत्र को दुनिया में सबसे बड़ी खुली हवा कला गैलरी के रुप में जाना जाता है। शेखावटी का इतिहास किसी उत्साह से कम नहीं है। यह क्षेत्र 18 वीं शताब्दी में शेखावट राजपूतों द्वारा स्थापित किया गया था। इस इलाके को सरदार राव शेखा जी ने बसाया था, जिनके नाम पर ही शेखावाटी प्रसिद्ध हुआ था। शेखावाटी की हवेलियाँ के अधिकांश भित्ति चित्र लगभग 125 से 150 वर्ष पूर्व के बने हैं। हवेलियों में अराइस की आलागीला पद्धती और दीवार की सूखी सतह पर भी चित्राकंन मिलते है। अराइस की गीली सतह के चित्रो में स्केच (कुराइ) तकनीक का सुन्दर प्रयोग किया है। अन्दर का हिस्सा आज भी सुरक्षित व सजीव है।

शेखावत शासकों द्वारा कई किलों और महलों का निर्माण किया गया था। इसके अलावा, शेखावट राजपूतों ने अपनी संरचनाओं में भित्तिचित्रों (गीले प्लास्टर पर पानी के रंगों का उपयोग करके दीवार पर चित्रकला की टिकाऊ विधि) पेश की थी। जिसके लिए ही यह चित्रित हवेली के रुप में मान्यता प्राप्त हैं। हवेली (वास्तुशिल्प महत्व वाले निजी मकान) विषयों के एक विस्तृत श्रृंखला को चित्रित करने वाली कलाओं के लिए भी प्रसिद्ध हैं। चित्रों में धार्मिक सभ्यताओं का चित्रण है यहां भगवान राम का जीवन, भगवान कृष्ण का जीवन और कई अन्य छवियां शामिल हैं, जिन्हें शेखावाटी में मकानों पर असाधारण रूप से चित्रित किया गया है। वहीं दूसरी और यहां प्रत्येक वर्ष फरवरी में शेखावाटी उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव का आयोजन राज्य पर्यटक विभाग और सीकर, चुरू और झुंझुनू के जिला प्रशासन मिलकर करते हैं। यह मेला इस प्रांत की ग्रामीण जीवन शैली को दर्शाता है। इस मेले में पर्यटकों को ऊँट और जीप की सफारी का मजा मिलता है। इसके अलावा पहाडों में सुरम्य स्थानों पर बने 'जीण माता मंदिर', 'शाकम्बरी देवी का मन्दिर', खाटू में 'बाबा खाटूश्यामजी का मन्दिर' और सालासर में हनुमान जी का मन्दिर आदि स्थान धार्मिक आस्था के ऐसे केंद्र हैं, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने को आते हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक का है।

महोत्सव: फरवरी में वार्षिक शेखावाटी महोत्सव


 माजुली - दुनिया का सबसे बड़ा ताजे जल का द्वीप

भारत के ऑफबीट गंतव्य

यदि आप शहरी शोर-शराबे से दूर कुछ दिन शांति में बिताना चाहते हैं तो माजुली द्वीप आपके लिए ही हैं। यह 'दुनिया के सबसे बड़े ताजे पानी के द्वीप' के रुप में जाना जाता हैं। यह अद्भुत नदी द्वीप ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित असम की सांस्कृतिक राजधानी - जोरहाट से केवल 20 किमी दूर स्थित है। गुवाहाटी से 200 किमी पूर्व माजुली आइलैंड तक पहुंचने के लिए फेरी लेनी पड़ती है क्योंकि यहां नदी पर पुल नहीं बने हैं। शहरी केंद्र से नौका नौकाओं से आसानी से पहुंचा जा सकता है। वास्तव में लोहित ब्रह्मपुत्र नदी के स्वरुप इसे आकार दिया गया था। ब्रह्मपुत्र नदी के बीचों-बीच 875 वर्ग किमी में फैला माजुली एक ऑफ बीट गंतव्य है। अगर आप घूमने के साथ-साथ कला और विरासत को भी जानने का शौक रखते हैं तो यहां आपको काफी कुछ मिलेगा। यहां हर एक घर में आपको नाव मिलेगी। बाढ़ आने के दौरान लोग इन नावों को ही अपना घर बना लेते हैं।

पानी से संतृप्त भूमि होने के नाते, माजुली समृद्ध वनस्पतियों और जीवों के साथ एक जीवंत मनोरंजन स्थल है, जिसमें बहुत से असामान्य और खतरनाक पक्षियों का घर है। जो सर्दियो के मौसम में आसानी से दिखाई पड़ते हैं। माजुली द्वीप के कुछ सबसे लोकप्रिय पक्षियों माइग्रेटरी बर्ड्स जैसे पेलिकन्स, स्कॉर्क्स, साइबेरियन क्रेन्स और व्हीसलिंग टील्स को आसानी से देखा जा सकता है। इनके अलावा यहां जंगली गीज़ और बत्तख भी पाए जाते हैं।

पक्षी देखने के स्थल:
• माजुली द्वीप का उत्तरी भाग
• माजुली द्वीप के दक्षिण पश्चिम और दक्षिणपूर्व भाग

समृद्ध वनस्पतियों और जीवों और पक्षी देखने के अलावा, माजुली के कुछ शीर्ष पर्यटक स्थलो में वैष्णव सतरा, पाल नाम और कई अन्य स्थल है। यहां आप बरतन बनाने एवं मुखौटा बनाने की पुरानी शिल्प कला को देख और सीख सकते हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर, नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी, मार्च का महीना


 गोकर्ण - अनदेखा समुद्री तट

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दक्षिणी राज्य कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ जिले में स्थित, गोकर्ण एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है। जो समुद्र तटों के रुप में भी विख्यात है। यह कहना गलत नहीं होगा कि गोकर्ण के समुद्री तट गोवा के अद्भुत समुद्र तटों के लिए कठिन प्रतिद्वंदी बन सकते हैं। इसके गोकर्ण नाम पड़ने के पीछे भी एक मान्यता है कि यह दो नदियों अग्निशिनि और गंगावली के संगम पर स्थित है। यह स्थानिय नदियों के ऐसे क्षेत्र में बसा हुआ है जो देखने में गाय के कान के रूप जैसा लगता है, और शायद इसी कारण इस स्थान का नाम गौकर्ण पड़ा है जिसका अर्थ होता है गाय का कान। यहां का कुडेल तट, गोकर्ण तट, हॉफ मून तट, पैराडाइज तट और ओम तट यहां के पांच प्रमुख तट है जो पर्यटकों का मन मोह लेते है। गोकर्ण तट, शहर के प्रमुख तटों में से एक है और महाबलेश्वार मंदिर की यात्रा करना यहां सबसे जरूरी माना जाता है। कुडेल तट, यहां के सभी समुद्र तटों में सबसे बड़ा माना जाता है। यहां की यात्रा एकदम घूमावदार यात्रा है इसके एक तरफ अरब सागर  है तो दूसरी तरफ कभी ना खत्म होने वाली पहाड़ी और चट्टानों की चोटियां है। जो कहीं और नहीं मिल सकती हैं।

गोकर्ण सबसे असाधारण स्थलों में से एक है यह एक तीर्थस्थल है जहां दूर-दूर से तीर्थयात्री आते हैं। गोकर्ण का महाबलेश्वसर मंदिर और वहां की शिवलिंग, पर्यटकों के बीच काफी प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यह शिवलिंग, रावण के द्वारा यहां तक लाई गई थी। महाबलेश्वकर मंदिर के अलावा, गोकर्ण में और भी कई मंदिर है जिनमें से महागणपति मंदिर, भद्रकाली मंदिर, वारादराजा मंदिर और वेंकटरमण मंदिर आदि प्रमुख है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: जनवरी, फरवरी, मार्च, अक्टूबर, नवंबर एवं दिसंबर का समय है।

करने के लिए चीजें: पैरासेलिंग, ट्रेकिंग, नाव की सवारी, स्नॉर्कलिंग इत्यादि


नुब्रा घाटी - लेह का छुपा हुआ खजाना

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लद्दाख के उत्तर-पूर्व में स्थित एक मस्तिष्ककारी घाटी, नुबरा घाटी खगोलीय, सुंदरता की एक अद्भुद भूमि है, जो एक सुंदर चित्रकला जैसी दिखती है। यह घाटी देखने में बिल्कुल कुदरत का करिश्मा लगती है। यह समुद्र तल से 10,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। यह क्षेत्र लद्दाख के बाग के नाम से जाना जाता है। गर्मियों के दौरान पर्यटकों को गुलाबी और पीले जंगली गुलाबों को देखने का मौका मिलता है जो कि इस क्षेत्र में उगते हैं। इसे फूलों की घाटी भी कहा जाता है। नुब्रा घाटी जम्मू कश्मीर राज्य के लेह से 150 किमी की दूरी पर सिल्क मार्ग पर स्थित है। यह श्योक और नुब्रा नदियों के संगम पर बनी है। श्योक नदी उत्तर पश्चिम की ओर बहती है और नुब्रा नदी इसमें उत्तर पश्चिम से आ कर मिलती है। श्योक नदी आगे जाकर सिन्धु नदी में मिलती है।

नुब्रा घाटी के आस पास के स्थान खार्दूंग ला दर्रा साल भर बर्फ से ढका रहता है। पनामिक गाँव, एन्सा मठ और दिस्कित मठ नुब्रा घाटी के मुख्य आकर्षण हैं। पनामिक गांव समुद्र तल से 10,442 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और पर्यटकों के बीच एक गर्म पानी के वसंत के लिए प्रसिद्ध है जो इस जगह के सरहद पर स्थित है। एन्सा मठ, अन्यथा एन्सा गोम्पा के नाम से जाना जाता है, इस गांव के आसपास के क्षेत्र में स्थित है। 350 साल पुराना दिस्कित मठ, अन्य प्रमुख आकर्षण है जो कि इस गंतव्य के सबसे पुराने और सबसे बड़े बौद्ध मठों में एक माना जाता है। हंडर गांव छुट्टियों के लिए अंतिम बिंदु है यहां भारतीय सेना के जवान सियाचिन बेस शिविर तक फैले हुए हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: जून, जुलाई, अगस्त, सितंबर तक

करने के लिए चीजें: डबल कूबड़ बैक्टियन ऊंट सफारी

अवश्य जाने वाले स्थान: बौद्ध मठ, समस्तलिंग मठ, दिस्कित मठ इत्यादि


 गुरुद्वोंग झील - ताजे पानी की झील

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लगभग 5,210 मीटर (17,100 फीट) की ऊंचाई पर स्थित, गुरूदोंगमार झील सिक्किम में गुरुद्वोंग झील के रूप में भी जानी जाती है जो दुनिया में सबसे प्रसिद्ध ताजे पानी की झीलों में से एक है। यह देश की दूसरी सबसे ऊंची झील (पहली बार चोलमु झील 18,000 फीट) है, गुरुद्वोंग झील को भारत में सबसे पवित्र झीलों में से एक माना जाता है। माना जाता है कि झील के पानी में उपचार गुण हैं जिसके कारण कई आगंतुक अपने साथ इसके पवित्र पानी को ले जाते हैं। इसके बाद भी यह जगह अभी भी अनछुई और अनपढ़ है, जो देखने और अनुभव करने के लिए बहुत कुछ छोड़ रही है। यह झील पहाड़ों की बर्फ से ढकी हुई है देखने में ऐसा प्रतित होता है जैसे यह बर्फों और पहाड़ो से गले मिल रही हो। गुरुद्वोंग झील सर्दियों के समय में पूरी तरह से जम जाती है।

लाचेन से गुरुद्वोंग झील तक साहसिक और रोमांचक यात्रा आपको एक शानदार अनुभव प्रदान करती है। आगंतुक भारतीय सेना से गुरुद्वोंग झील से त्सो लस्मो झील तक यात्रा करने की अनुमति ले सकते हैं। गुरुद्वोंग झील को थैंगू के माध्यम से लाचेन तक सड़क द्वारा पहुंचा जा सकता है। यह झील एक धार्मिक स्थल है। जो सभी धार्मिक मान्यताओं के लोगों के लिए पूजा का घर है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: नवंबर से जून तक का है


मालाना - हिमाचल प्रदेश का एकान्त सौंदर्य

 भारत के ऑफबीट गंतव्य

वास्तव में ऑफबीट गंतव्य, मालाना एक ऐसा स्थल है जिसके बारे में आपने बहुत कम सुना होगा। किन्तु यह भारत के सबसे सुंदर जगहों में से एक है। जिसके बारे में लोगों को कम जानकारी है। हिमाचल की कुल्लू घाटी अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश के पर्यटकों के बीच प्रसिद्ध है। इसी कुल्लू की पार्वती घाटी में स्थित चंद्रखणी पर्वत के आलय में बसा है विश्व का प्राचीनतम लोकतंत्र मलाना गाँव है। नदी से सटी खूबसूरत पहाडियों पर लगभग समुद्र तल से 8500 फुट की ऊंचाई पर बसा मलाना गांव शहरी सभ्यता और आधुनिकता से काफी समय तक अनछुआ रहा है। ये गाँव तीन पहाड़ी दर्रों से घिरा हुआ है। मलाना से सम्बंधित कई प्रकार की रहस्यमयी जनश्रुतियां प्रचलित हैं । मलाना पूरी तरह से दुनिया से अलग एक प्राचीन गांव है। मलाना की अपनी एकवचन जीवनशैली और सामाजिक व्यवस्था है जहां मूल निवासी अपनी अनूठी रीति-रिवाजों की सराहना करते हैं और उनका पालन करते हैं। मलाना को दुनिया के पहले लोकतंत्रों में से एक के रूप में देखा जाता है, मलाना मिश्रित वृत्तचित्र फिल्मों के अध्ययन का क्षेत्र रहा है जिसमें 'मालाना, ए लॉस्ट आइडेंटिटी' और 'मालाना: हिमालयी गांव का वैश्वीकरण' शामिल है।

यहाँ की भवन निर्माण कला , रहस्यमयी कनाशी भाषा , परम्पराएं और विधान , यहां का लोकतांत्रिक ढांचा सब अपने कप में एक उत्सुकता और रहस्य समेटे हुए हैं। यहां आने वाले यात्रियों को विशेष सलाह दी जाती है कि वो गावं के रीति-रस्मों के साथ छेडछाड़ ना करें। यहां जगह-जगह पर निषिद्ध क्रियाकलापों की सूचना देते बोर्ड लगाए गए हैं। बाहरी व्यक्तियों को गांव की अधिकतर चीज़ों को छूने की मनाही है। यहाँ आप फोटोग्राफी तो कर सकते हैं, पर दैवीय स्थलों की वीडियोग्राफी करने पर रोक है। इन नियमो का उलंघन करने पर आपको जुर्माना देना पड़ता है या किसी विशेष परिस्थिति में ग्रामीण आपको गाँव छोड़ने के लिए भी कहा जा सकता हैं। यदि आप किसी मना की गई वस्तु को छू देते हैं, तो पर्यटकों को मालानियों के अनुसार छुई गई या अशुद्ध वस्तु को पवित्र करने के लिए पशु बलिदान के लिए मुआवजे के रूप में जुर्माना अदा करने के लिए कहा जाता है। पर्यटकों को एक विधिवत हस्ताक्षरित 'सहमति पत्र' जमा करना होता है, यह बताते हुए कि मालाना में जो कुछ भी होता है उसे स्थानीय शासकिय निकाय द्वारा संबोधित किया जाएगा और कोई अन्य कानूनी शक्ति उसमें कदम नहीं उठा सकती है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: मार्च से अक्टूबर तक का है


 सैंडकफू - साहसकारों की भूमि

भारत के ऑफबीट गंतव्य

लगभग 11, 941 फीट (3,636 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित, सैंडकफू पूर्वी बंगाल के पूर्व में स्थित सबसे ऊंची चोटी है। यह पश्चिम बंगाल-नेपाल सीमा पर स्थित है। यह दो देशों के अद्भुद संगम को दर्शाती है क्योंकि आप यह समझ ही नहीं पाएगें कि कब आप भारत में हैं और कब नेपाल में। इसकी खूबसूरती का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यहां उगते हुए सूर्य की आकर्षक चमक का आनंद आपको और कहीं नहीं देखने को मिलेगा। यह वो जगह है जहां से आप दुनिया की पांच सबसे ऊंची चोटियों में से चार को एक साथ देख सकते हैं। ये हैं दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर), तीसरे नंबर की और भारत में सबसे ऊंची कंचनजंघा (8585 मीटर), चौथे नंबर की लाहोत्से (8516 मी) और पांचवे नंबर की मकालू (8463 मी). खास तौर पर कंचनजंघा व पंडिम चोटियों का नजारा तो बेहद आकर्षक होता है। यही हर साल देश-विदेश से रोमांच-प्रेमियों को यहां खींच लाता है।

शब्द 'सांडकफू' का मतलब है 'शिखर पौधों की ऊँचाई'  यह जहरीले एकोनाइट फ्लोरस के लिए जानी जाती है जो शिखर के निकट बहुतायत में पाए जाते हैं  मनयभंजन से संदकफू होते हुए फालुत तक का रास्ता सड़कनुमा है। लेकिन यह सीधी-साधी सड़क नहीं बल्कि ज्यादातर जगहों पर खड़ी चढ़ाई वाली और पूरे रास्ते पथरीली सड़क है। सैंडकफू केवल ट्रेकिंग द्वारा पहुंचा जा सकता है जो आम तौर पर 12 घंटे से अधिक समय लेता है, लेकिन ट्रेकर को आमतौर पर छोटे गांवों में एक स्टॉपओवर बनाना पड़ता हैं। ट्रेकिंग पथ आगंतुकों को सिंगलिला नेशनल पार्क के माध्यम से ले जाता है, जहां कोई प्रसिद्ध लाल पांडा, क्लाउड तेंदुए, गोल्डन ब्रेस्टेड फुल्वेतटा, हिमालयी न्यूट और हिमालय के काले हिरणों की अदुभुद झलक भी आप यहां देख सकतै हैं। की एक झलक देख सकता है। पूर्वी हिमालय में यह सबसे पसंदीदा ट्रेकिंग मार्ग है, कंचनजंगा और माउंट एवरेस्ट के शानदार पैनोरमा के लिए, पूरे परिदृश्य में हिमालयी जंगली फलों और दुर्लभ पक्षियों को एक साथ देखने का दुर्लभ नजारा आपकों मिलता है। यहां बौद्ध धर्म के अनुयायी अधिक हैं पूरे इलाके में फैले गोम्पा व मठ इसके गवाह हैं। जहां आपकों प्रकृति और संस्कृति का अदुभुद संगम देखने को मिलता है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: अप्रैल से मई और अक्टूबर से नवंबर तक का है


धनुष्कोदी – भूतों का शहर

भारत के ऑफबीट गंतव्य

स्थानीय भाषा में अक्सर 'दानुष्कोदी'  को एक त्याग किए हुए शहर के रुप में वर्णित किया जाता हैं। जिसमें कई महत्वपूर्ण अवशेष मिले हैं। धनुषकोडी एक गांव है जो रामेश्वेरम द्वीप पर स्थित है। रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणपूर्व बिंदु पर स्थित, जिसे पंबन द्वीप भी कहा जाता है, यह गांव, श्रीलंका में स्थित तलाईमन्नाकर से 31 किमी. की दूरी पर स्थित है। 1964 के चक्रवात से पहले, धनुषकोडी एक उभरता हुआ पर्यटन और तीर्थ स्थिल था। वर्ष 1964 के दौरान, इस क्षेत्र में आए बड़े तूफान ने इसे खाली छोड़ दिया। किवंदंतियों के अनुसार, विभीषण, रावण के भाई ने इसी स्थावन पर भगवान राम से सेतू तोड़ने के लिए कहा था और भगवान राम ने एक ही बाण से सेतू को तोड़ दिया था।। इसी कारण, इस स्थाइन का नाम धनुष्कोड़ी रखा गया। इस शहर को भगवान राम से जोड़कर देखा जाता है आज भी यहां पुल की एक रेखा देखी जा सकती है जिसके बारे में मानना है कि इसे भगवान राम ने वानर सेना के साथ मिलकर बनाया था। इस सेतु को अज भी भगवान राम का सेतू ही माना जाता है। इस सेतू से मिलने वाला जल, यात्रियों के लिए पवित्र जल होता है। इस पानी से भक्तर स्नान करते है। कई लोगों का मानना है कि जो लोग काशी में गंगा स्नान करते है वह धनुष्कोड़ी में आकर स्नान कर लें तो उनकी तीर्थयात्रा सफल हो जाती है। रामेश्वरम की तीर्थयात्रा को पूरा करने से पहले धनुष्कोदी के महासागर में पवित्र डुबकी लगाना जरुरी होता है। इसके अलावा, धनुष्कोदी को बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर की पवित्र संगम के रूप में भी जाना जाता है। चूंकि धन धनुष्कोदी में उथला है, यात्रियों को बंगाल की खाड़ी में चलना पड़ सकता है। यहां आप रंगीन मछलियों, कोरल, स्टार मछलियों और समुद्री कुकू देख सकते हैं।

नोट: यहां दिन में यात्रा करने के लिए सलाह दी जाती है और सूर्यास्त से पहले रामेश्वरम वापस आने को कहा जाता है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: पूरे वर्ष में कभी भी जा सकते हैं।


पापी हिल्स - प्राकृतिक सुंदरता का एक आदर्श उदाहरण

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आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी और पश्चिम गोदावरी जिलों और तेलंगाना में खम्मम जिले की सीमा बैठक में स्थित, पापी हिल्स प्राकृतिक सुंदरता का एक आदर्श उदाहरण है। तेलुगू की स्थानीय भाषा में लोकप्रिय रूप से इसे पापी कोंडुला के नाम से जाना जाता है, पापी हिल्स को अपने खूबसूरत परिवेश के लिए 'दक्षिण भारत का कश्मीर' माना जाता है जो झरने के साथ संपन्न होता है। यहां का आदिवासी समूह बहुत शांत है और पर्यटकों को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचाते है। यहां की पर्वत श्रृंखलाओं को मूल रूप से पापीदी कोन्दालु के नाम से जाना जाता है जिसका तेलूगू में अर्थ होता है विभाजित करना। इस श्रृंखला का नाम ऐसा इसलिए रखा गया, क्योंकि यह गोदावरी नदी को विभाजित कर देती है। कुछ लोगों का मानना है इस पहाडी़ को ऊपर से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे - किसी महिला ने अपने बालों में मांग भरी हो।

आगंतुक राजामंड्री से या कुनवारम से सुंदर स्थान में प्रवेश कर सकते हैं। पापी हिल्स अनछुए प्रकृति के बीच आश्चर्यजनक नाव की सवारी के बारे में प्रसिद्ध है। यह पहाड़ी, यहां स्थित खूबसूरत झरनों के कारण काफी प्रसिद्ध है जिसे मुनीवातम के नाम से जाना जाता है। यह एक आदिवासी बेल्टध है जहां सुंदर और शांत वातावरण है। पापीकोंदालु में कई प्रकार के पशु और वनस्पिदयां है। यहां एक वन्य जीव अभयारण्ये भी स्थित है जहां कई प्रकार के पक्षी और जन्तु् देखने को मिलते है जैसे - चीता, पैंथर, रिण, हाइना आदि हैं। पापी हिल्स के लिए नाव यात्रा नियमित रूप से पोलावरम, भद्रचलम और कुनवारम से संचालित होती है। स्पेलबाइंडिंग पहाड़ी वुडलैंड को गले लगाती हैं पर्यटक आंध्र प्रदेश पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर ऑनलाइन माध्यम से नाव की सवारी बुक कर सकते हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: पूरे साल में कभी भी जा सकते हैं।


नौकुचियाताल - नौ कोनों की झील

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उत्तराखंड में स्थित एक सामान्य पहाड़ी स्टेशन, नौकुचियाताल समुद्र तल से 4,002.62 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। जो गर्मी के मौसम में राहत देने के लिए एक आदर्श स्थान है। इस झील के कुल नौ कोने हैं जिसकी वजह से ही इस झील का नाम नौकुचियाताल पड़ गया है। चारो तरफ से हरे भरे पहाड़ियों से घिरे एक झील की गहराई 175 फ़ीट है ये झील नैनीताल जिले की सभी झीलों में सबसे गहरी है। यह सुंदर झील लगभग 980 मीटर तक फैली हुई है। नौकुचियाताल झील निश्चित रूप से प्रदूषण और गर्म वायुमंडलीय परिस्थितियों से दूर शांति और प्राकृतिक निकटता सें संपूर्ण हैं। इस झील के बारे में मान्यता यह है कि  अगर कोई झील के सारे कोने एक साथ देख ले तो वो अमर हो जायेगा।

पहाड़ी स्टेशन में भारी बारिश और सर्दी के मौसम में ठंडी बर्फबारी का मजा लेने के लिए यह एक सबसे अच्छा स्थल है। यहां भगवान ब्रह्मा को समर्पित एक छोटा हिंदू मंदिर भी पर्यटकों को खासा पसंद आ सकता है जहां लोग आशीर्वाद पाने के लिए झील की परिक्रमा करते हैं। नौकुचियाताल झील के नजदीक के स्थानों में से कुछ में मुक्तिश्वर, सत ताल, हनुमान मंदिर, नैनीताल, अल्मोड़ा, रानीखेत, भीम ताल, हल्दवानी और अन्य स्थल शामिल हैं। कुल मिलाकर, नौकुचियाताल हरित क्षेत्रों के पैनोरमा, जंगली फलों के कंबल और पक्षियों के धुनदार गीतों से संपूर्ण जगह है। पर्यटक नौकुचियाताल झील में बोटिंग का और झील के आस पास पैराग्लाइडिंग का आनंद ले सकते हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: मार्च से जून और सितंबर से नवंबर तक का समय है।


लोनार – खारे पानी की झील

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लोनार झील महाराष्ट्र के बुलढ़ाणा ज़िले में स्थित एक खारे पानी की झील है। इसका निर्माण एक उल्का पिंड के पृथ्वी से टकराने के कारण हुआ था। माना जाता है कि लगभग 50,000 साल पहले धरती से उल्का पिंड के टकराने  के कारण इस झील  की उत्पत्ति हुई थी। लोनार झील समुद्र तल से 1,200 मीटर ऊँची सतह पर लगभग 100 मीटर के वृत्त में फैली हुई है। इस झील का मुहाना गोलाई लिए एकदम गहरा है, इसकी गहराई लगभग 500 मीटर तक है। यह दुनिया की तीसरी अण्डाकार झील है। यह झील खारे पानी की झील है जिसमें नमक ही नमक है इसमें नमक की मात्रा इतनी ज्यादा है कि इस झील में कोई भी शरीशृप नहीं है। इसका पानी अम्लीय और क्षारीय दोनो ही हैं। सरोवर के पानी में आपको नमक के टुकड़े भी नज़र आएँगे। इस पानी में कई जलीय पदार्थ भी है। लोनार झील को लेकर पौराणिक कथा भी है कि इसमें राक्षस का रक्त व मांस है जिसके कारण यह झील खारी है।  कहा जाता है कि पद्म पुराण, स्कंद पुराण और आइन-ए-अकबरी में भी इस गड्ढ़े के बारे में उल्ले,ख किया गया है। जानकारी के अनुसार एक ब्रिटिश अधिकारी जेई अलेक्जेंडर ने सबसे पहले इस गड्ढे के बारे में खोजबीन की थी। यह क्रेटर 52,000 साल पहले बन गया था। इस झील में जानवर तो दूर पेड़-पौधे भी उत्पन्न नहीं होते वहीं इसके आस-पास की जगहों पर खेती खूब की जाती है।

लोनार झील अपने इतिहास और बनावट के कारण विश्व प्रसिद्ध है। पर्यटको के लिए इस विचित्र झील के देखने का अवसर है। इस झील की सुंदरता किसी का भी मन मोह लेने का दम रखती है। झील बन जाने के बाद यहां का दृश्य देखने में काफी आकर्षक और सुंदर लगता है। पास में ही 3 किमी. की दूरी पर कमला माता मंदिर भी स्थित है।  लोनार में कई जंगली पशु-पक्षी जैसे चिंकारा, गैज़ेल, टेलर पक्षी, मैग्ज़ीज, ब्लैक ड्रौंगगोस, ग्रीन बी ईटर इत्यादि विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षी देखने को मिल सकते हैं। महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम द्वारा संचालित एक पर्यटक रिसॉर्ट स्थल के निकट ही उपलब्ध है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से मार्च तक का है


खज्जियार - मिनी स्विट्जरलैंड

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अगर आप स्विट्जरलैंड जाने के शौकिन है लेकिन इतनी दूर जाने का आपके पास बजट या समय नहीं है तो आपको निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि भारत में भी एक ऐसी जगह है जिसे मिनी यानि छोटा स्विज़रलैंड के नाम से जाना जाता है जो स्विज़रलैंड की खूबसूरत वादियों से किसी भी तरह कम नहीं है। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित एक शांत छोटा पहाड़ी स्टेशन अपने आप में एक अद्भुत, मोहक गंतव्य स्थल है जहां जाते ही आप विदेश को भूल जाएगें। चीड़ और देवदार के ऊँचे-लंबे, हरे-भरे पेड़ों के बीच बसा खज्जियार बेहद खूबसूरत है। यहां आकर ऐसा लगता है मानो प्रकृति ने झील के चारों ओर हरी-भरी मुलायम और आकर्षक घास की चादर बिछा रखी हो। शहर के शोर-शराबे और चिलचिलाती गर्मी से दूर खज्जियार एक शांत और ठंडी सूकून देने वाली जगह है।। घूमने वाले शहरों और कस्बों से दूर, इस शांत पहाड़ी स्टेशन में शहर के दिल में एक छोटी सी झील है, जिस पर एक अस्थायी भूमि द्रव्यमान है। पतली जलप्रपात से बहने वाली, यह मामूली झील खज्जियार की भूमि के उदार मार्ग के बीच में स्थित है। कहा जाता है कि खज्जियार को आधिकारिक तौर पर 7 जुलाई, 1992 को स्विस राजदूत द्वारा नाम दिया गया था और रिकॉर्ड के अनुसार, यहां से एक पत्थर लिया गया था और स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में बनी पत्थर की मूर्तिकला का हिस्सा बनाया गया था।

खज्जियार में एक खूबसूरत झील है, जिसे खज्जियार लेक के नाम से जानते हैं। इस विशाल लेक के बीच दो छोटे टापू हैं, जिन पर पहुंचकर पर्यटक आनन्द ले सकते हैं। झील के चारों ओर हरी-भरी मुलायम और आकर्षक घास खज्जियार को सुंदरता प्रदान करती है। यहां चीड़ और देवार के पेड़ इसे ढके रहते हैं। झील के बीच में टापूनुमा दो जगहें हैं, जहां पहुंचकर पर्यटक और रोमांचित हो जाता है अप्रैल से जून महीने के बीच जाकर यहां इस लेक में बोटिंग का आनन्द लिया जा सकता है। खज्जियार के ठीक नजदीक स्थित है कालटोप वन्य जीव अभ्यारण्य। चीड़ और देवदार के ऊंचे पेड़ों से आच्छादित इस अभयारण्य में कई दुर्लभ जंगली जानवर और पक्षियों को देख सकते हैं। पशु और पक्षी प्रेमी शैलानियों के लिए यह स्थान अद्वितीय है।

समुद्र तल से लगभग 2,000 मीटर की दूरी पर स्थित, सुरम्य पहाड़ी स्टेशन खज्जियार किसी स्वर्ग से कम नहीं है। खज्जियार की भूमि को पवित्र माना जाता है कुल मिलाकर, खक्कीर तीन अलग-अलग पारिस्थितिक तंत्र, अर्थात वन, चरागाह और झील का एक अद्वितीय संयोजन यहां देखने को मिलता है। इसके अलावा, खज्जियार आगंतुकों के लिए बहुत सारे ट्रेकिंग अवसर प्रदान करता है। खज्जियार के आसपास के स्थानों में दौलाधर पहाड़, नाग मंदिर और अन्य स्थल शामिल हैं। आप एक बार यहां जाएगें तो लगेगा कि किसी और दुनिया में आ गए हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: मार्च से अक्टूबर तक का है।

नोट: खज्जियार कलातोप खज्जियार अभयारण्य का हिस्सा है


 द्रास - लद्दाख का गेट

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कारगिल से लगभग 60 किमी दूर, लेह से 270 किमी और जम्मू-कश्मीर में श्रीनगर से 140 किमी दूर स्थित, द्रास एक ऐसा स्थल है जहां आप गर्मी से दूर कड़कड़ती ठंड का मजा ले सकते हैं। जहां पूरे शहर में भयंकर गर्मी होती है वहीं द्रास में ठंड का मजा ही कुछ और होता है। ठंड में तो यहां का पारा -50 डिग्री सेल्सियस के नीचे चला जाता है। द्रास समुद्र तल से 3280 मीटर की ऊंचाई पर स्थित 'लदाख का प्रवेश द्वार' है। यह शहर पर्यटकों के बीच अपने उबड़ खाबड़ प्राकृतिक दृश्य के कारण प्रसिद्ध है। द्रास प्रसिद्ध टोलोलिंग रेंज और टाइगर हिल का एक शानदार दृश्य प्रदान करता है जिसे पॉइंट 4660 भी कहा जाता है जो कई ट्रेकिंग पथों के आधार पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

द्रास एक गांव है, जहां ना ऊँची ऊँची बिल्डिंग है, ना ही शोर करते हुए वाहन, अगर है तो सिर्फ बर्फ से ढके पहाड़, और बर्फीले रेगिस्तान जो आँखों के साथ साथ मन को शांति और ठंडक पहुंचाते हैं। द्रास को कारगिल युद्धो के स्मृति चिन्ह के रुप में भी जाना जाता है। यहां सबसे आकर्षण का केन्द्र कारगिल वॉर मेमोरियल है जिसे बिम्बत वार मेमोरिअल भी कहते हैं। यहग कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए बनाई गई है। द्रास घूमने आने वाले पर्यटक यहां लद्दाख भी घूम सकते हैं। यह जगह अपने प्राचीन मठों, अन्य धार्मिक स्थलों , राजशाही महलों , विभिन्न गोमपास , पर्वत चोटियों , वन्यजीव सफारी, साहसिक गतिविधि के धब्बे और समावेशी के लिए प्रसिद्ध है। यहां की प्रसिद्ध सुरु घाटी में ट्रेकिंग, आमतौर पर 72 घंटे चलती है,  जो कई, सुंदर गांवों और फूल बगानों का सौंदर्य़ दिखते हुए चलती है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: मई से सितंबर तक का है।


 चिखलदरा - महाभारत के चिन्हों का प्रतिक

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प्राचीन भारत के संस्कृत महाकाव्य में महाभारत में संदर्भित चिखलदरा एक बहुत ही प्राचीन जगह है। महाराष्ट्र के विदर्भ स्थित चिखलदरा में अज्ञातवाद के दौरान पांडवों ने यहां कुछ समय बिताया था और यह वही जगह है जहां भीम ने द्रौपदी का अपमान करने पर किचक का वध किया था। महाभारत के पात्र किचक ने द्रौपदी से अनैतिक व्यवहार करने की कोशिश की थी, जिसके बाद भीम ने अपना विकराल रूप दिखाकर कीचक का वध कर उसे पास की खाई में फेंक दिया था। अब यह स्थान एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन चुकी है। चिखलदरा समुद्र तल से 3898 फीट (1,188 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है जिसे स्थानीय भाषा में 'भीम कुंड' भी कहा जाता है, यह विदर्भ क्षेत्र का एकमात्र पहाड़ी स्टेशन है। इसके अलावा इसकी प्रसिदधी का एक और कारण है कि यह महाराष्ट्र का एकमात्र कॉपी बगान क्षेत्र है। चिखलदरा में पैंथर्स, जंगली कुत्तें, जंगली सूअर, सांभर आदि भी देखे जा सकते हैं।
चिखलदरा एक खूबसूरत हिल स्टेशन है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां तक का सफर तय करते हैं। यह पहाड़ी इलाका अपनी नैसर्गिक सौन्दर्यता के लिए जाना जाता है। चिखलदरा सतपुड़ा की पहाड़ी का एक खूबसूरत भाग है। जो चारों तरफ से प्राकृतिक खूबसूरती से भरा हुआ है। जहां आप झीलों, पहाड़ी हरियाली व प्राचीन दुर्गों की खूबसूरती का आनंद ले सकते हैं। भीम कुंड और कॉफी बगानों के अलावा चिखलदरा में आप यहां की पांच पहाड़ियों को और गिरते जलप्रपात को भी देख सकते हैं। पास स्थित देवी कुंड अपनी सुंदर जल धाराओं के लिए जाना जाता है। इस किले में प्राचीन खूबसूरत मूर्तियां मौजूद हैं, जो आज भी ठीक-ठाक अवस्था में हैं। आप यहां रखी गई तोपों को भी देख सकते हैं। इसके अलावा यहां की झीलें भी देखने लायक हैं। यहां के सुंदर,शाही शाही पेड़ कोहरे से ढके और रहस्यमय दिखलाई पड़ते हैं। चिखलदरा एक परिपूर्ण ग्रीष्मकालीन गंतव्य स्थान है जहां आप टंजक का एहसास ले स सकते हैं। उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि अमरावती जिले में शानदार मेलघाट टाइगर रिजर्व (परियोजना टाइगर) चिखलदरा पहाड़ी स्टेशन से केवल 86.5 किमी दूर है (एमएच एसएच 204 और एमएच एसएच 203 के माध्यम से)। चिखलदरा के नजदीकी ब्याज के कुछ अन्य स्थानों में चिखलदरा वन्यजीव अभयारण्य, वान अभयारण्य, गाविलगढ़ किला, शककर झील और इसी तरह के अन्य लोकप्रिय पर्यटक स्थल आकर्षण शामिल हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: अक्टूबर से जून तक का है


 रूपकुंड झील - भारत की कंकाल झील

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उत्तराखंड में स्थित रुपकुंड झील एक रहस्यमयी झील के रुप में जानी जाती है। यह उच्च ऊंचाई पर स्थित एक बर्फीली झील है जिसके बारे में रहस्य आज भी बरकरार है। इस झील की प्रसिद्धि इतनी है कि स्थानिय और राष्ट्रीय अखबारो में यह मुख्य पृष्ठ का हिस्सा बन गई थी जिस समय इसमें से मानव कंकाल खोजे गए थे यह हर समाचारपत्र और चैनल की प्रमुख खबर में थी। यह झील यहाँ पर मिलने वाले नरकंकालों के कारण काफी चर्चित रहती हैं। यहाँ पर गर्मियों में बर्फ पिघलने के साथ ही कही पर भी नरकंकाल दिखाई देना आम बात हैं।  यह झील एक ऐसे स्थान पर स्थित है जो रेगिस्तान है और लगभग 16,499 फीट (5,029 मीटर) की ऊंचाई पर हिमालय में स्थित है। रूपकंद झील बर्फ से ढके पर्वत श्रृंखलाओं और हिमनदों से घिरी हुई है जो इसे आदर्श ट्रेकिंग बनाते हैं। वास्तव में, रूपकंड झील हिमालय में सबसे खतरनाक ट्रेकिंग स्थल में से एक है। यह भी कहा जाता है कि यहां से ही भगवान शिव पार्वती को कैलाश की ओर ले गए थे। जब रास्ते में पार्वती को प्यास लगी तो भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से इस पर्वत पर एक झील बना डाली थी जिसका पानी पीकर पार्वती ने अपनी प्यास तो बुझाई थी वही इस झील में अपने प्रतिविंब को देखकर पार्वती ने इसे ही रूपकुण्ड का नाम दिया था।

इस झील पर ट्रेकिंग करना एक लुभावना अनुभव होता है। उत्तरांचल के चमोली ज़िले के सीमान्त देवाल विकास खांड में स्थित प्रसिद्ध नंदादेवी राजजात यात्रा मार्ग पर नंदाकोट, नंदाघाट और त्रिशूल जैसे विशाल हिम पर्वत शिखरों की छांव में चट्टानों तथा पत्थरों के विस्तार के बीच फैली हुई है। यह झील प्रकृति का अनमोल तोहफा है। यहां आपको प्रकृति का ऐसा मनोरम दृश्य देखने को मिलेगा जो हमेशा आपकी सुनहरी यादों में बना रहेगी। यहां की जलवायु स्वास्थ्यवर्धक है। यहां मौसम की स्थिति के साथ अच्छे भाग्य के साथ, कोई भी व्यक्ति यहां 5 से 6 दिनों के बीच ट्रेकिंग खत्म कर सकता है। रूपकुंड ट्रेक देश में पसंदीदा ट्रेक मार्गों में से एक माना जाता है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: मई-जून और सितंबर-अक्टूबर का महीना है।


चेम्ब्रा शिखर - वायनाड का उच्च शिखर

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यदि आप प्राकृतिक सौंदर्य को देखने और जानने के इच्छुक हैं और यदि आपके पास रोमांच के लिए जुनून है, तो वायनाड में चेम्ब्रा शिखर, आपके लिए आदर्श स्थान होगा। चेम्ब्रा पर्वत भारत के केरल प्रदेश में पश्चिमी घाट के अन्तर्गत्त वायनाड पर्वत का सागर सतह से 2,100 मीटर (6,900 फीट) ऊँचाई पर स्थित है। चेम्ब्रा मेप्पदी शहर के नजदीक स्थित है और कलपेटा शहर से सिर्फ 8 किमी दूर है।

इससे निकटवर्ती राज्य तमिल नाडु की नीलगिरि पर्वतमाला एवं केरल के कोज़िकोड़ जिले की वेल्लरिमलय पर्वत शृंखलाएं जुड़ती हुई हैं। चेम्ब्रा पर मेप्पड़ी से पैदल चढ़ाई का रास्ता है। इस शिखर की यात्रा में एक दिल के आकार वाली झील पड़ती है जिसे माना जाता है कि यह कभी नहीं सूखती। मेप्पड़ी कस्बे से लगभग 5 कि.मी दूरी पर एरुमकोल्ली के चाय बागान देखे जा सकते हैं। चेम्ब्रा शिखर पर ट्रेकिंग करने हेतु मेप्पड़ी स्थित वन विभाग कार्यालय से अनुमति ली जा सकती है

मेम्पेडी से ट्रेकिंग करके चेम्ब्रा पीक पहुंचा जा सकता है। जिला पर्यटन पदोन्नति परिषद (डीटीपीसी) पर्यटक गाइड और किराये के लिए ट्रेकिंग प्रदान करती है। चेम्ब्रा चोटी के रास्ते में आम तौर पर, चोटी के लिए ट्रेकिंग में 180 मिनट लगते हैं, और आगंतुक पूरे वायनाड और मलप्पुरम, नीलगिरी जिलों (तमिलनाडु) और कोझिकोड के मनोरम दृश्य का आनंद ले लेते हुए ट्रेंकिंग करते हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: पूरे साल में कभी भी


पालोलेम बीच - गोवा की अनदेखी सुंदरता

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पालोलेम  तट गोवा में सबसे प्यारे समुद्र तटों में से एक है। यह एक प्राकृतिक समुद्र तट है जो दोनों तरफ ऊंचे अग्रभूमि से घिरा हुआ है। जिसका नतीजा  यह है कि यह बहुत ही सुंदर और शांत, आदर्श समुद्र स्थल है। दक्षिण गोवा में स्थित  इसे “स्वर्ग समुद्र तट” के रूप में भी जाना जाता है यह समुद्र तट एक मील लंबा है गोवा में यह समुद्र तट पर्यटन के मामले में बहुत विकसित नहीं है। इसलिए आप यहां भीड़ भाड़ से दूर शांति का अनुभव कर सकते हैं। समुद्र तट का एक बड़ा क्षेत्र अब बहुत छोटे छोटे ढांचे के साथ आता है। यहां डॉल्फिन यात्राओं और मछली पकड़ने की यात्राएं अन्य लोकप्रिय आकर्षण हैं इन्हें काफी उचित दर पर पेश किया जाता है। यहां आवास आसानी से उपलब्ध है।

हालांकि, पालोलेम के पास कोई बैंक नहीं है। निकटतम रेलवे स्टेशन कैनाकोना में है, जो कि पालोलेम से सिर्फ 3 किमी दूर है। हैं। समुद्र तट के उत्तरी छोर पर एक ताज़ा जल धारा है इस धारा के पार एक छोटा, अविकसित द्वीप है जिसे कम ज्वार के दौरान बस तैरने से पहुंचा जा सकता है।

पालेलेम समुद्र तट के दोनों किनारों में समुद्र में निकलने वाले बहुत सारे चट्टानों की सुविधा है। सागर की गहराई चरण-दर-चरण बढ़ जाती है, जो पूर्वोत्तर अंत में उथल-पुथल होती है, जिससे शौकिया तैराकों के के लिए इसे और सुरक्षित बना दिया जाता है। चूंकि पालोलेम एक शांत छोटा शहर है, इस क्षेत्र को आसानी से चलकर खोजा जा सकता है! इसके अलावा, किराए के लिए मोटर बाइक, ऑटो रिक्शा और टैक्सी उपलब्ध हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: पूरे साल में कभी भी जा सकते हैं।


थारंगंबदी - गाती लहरों का स्थान

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थारंगंबदी तरंक्यूबार के रूप में जाना जाता है, थारंगंबदी  दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के नागापट्टिनम जिले में स्थित एक खूबसूरत तटीय शहर, है जिसे अभी खोजा जाना बाकी है। दक्षिणी बंदरगाह शहर कराइकल से सिर्फ 13.4 किमी दूर स्थित थारंगंबदी एक ऐतिहासिक शहर है जहां डेनिश कनेक्शन बहुत अधिक है। इस शांत छोटे तटीय शहर को पहली बार 1620 के दौरान डेनिश द्वारा एक व्यापारिक पद के रूप में खोजा गया था और इसकी स्थापना की गई थी। यह क्षेत्र लगभग 225 वर्षों तक डेनिश के प्रभुत्व में था और आखिरकार ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस पर 1845 के दौरान अधिग्रहण किया था।

थारंगंबदी एक शहर है, जो समुद्र के पाश स्थित है. इसकी पृष्ठभूमि में विशाल डेनिश इतिहास के साथ अपनी गायन तरंगों का भाव छिपा है। शहर का इतिहास, मुख्य रूप से डेनिश निपटान और औपनिवेशिक काल से जुड़ा हुआ है, जिसे डेनिश संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय डेनिश पांडुलिपियों, सजाए गए टेराकोटा वस्तुओं, हथियारों को प्रदर्शित करता है। इसके अलावा, शहर का प्रमुख पर्यटक आकर्षण राजसी डेनिश किला है जिसे फोर्ट डान्सबोर्ग कहा जाता है। प्राचीन किला वास्तुकला की डेनिश शैली की विशिष्टता को प्रदर्शित करता है जो दक्षिणी भारत में कहीं और ढूंढना मुश्किल है। इस शहर में कई चर्च भी हैं क्योंकि कई ईसाई मिशनरियों को डेनिश-शहर में बसाया गया था। कुल मिलाकर यह एक शांत पर्यटन स्थल है जो शहरी चकाचौंध से दूर प्रकृति के करीब है।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: पूरे साल में कभी भी जा सकते हैं


मासिनराम - पृथ्वी पर सबसे अधिक वर्षा का स्थान

भारत के ऑफबीट गंतव्य

अब तक आपने भारत में सबसे ज्यादा वर्षा होने वाले स्थान के नाम में चेरापूंजी को ही सूना होगा। किन्तु चेरापूंजी के ही निकट एक ऐसा स्थान है जहां साल के 12 महीने बारिश होती है। जिसे मासिनराम के रुप में जाना जाता है। मासिनराम मेघालय में स्थित है, जो अपनी प्राकृतिक सुन्दरता और अत्यधिक वर्षा के कारण प्रसिद्ध है। मेघालय के इस स्थान को विश्व में सबसे अधिक वर्षा वाले स्थान के रूप में जाना जाता है। सिनराम में दुनिया का सबसे अधिक बारिश और नम इलाका है. यहां करीब 11,871 मिलीमीटर वर्षा होती है। यहां लोग कभी भी बिना छाता लिए घर से बाहर नहीं निकलते हैं। बंगाल की खाड़ी की वजह से मासिनराम में काफी ज़्यादा नमी है और 1491 मीटर की ऊंचाई वाले खासी पहाड़ियों की बदौलत यह नमी संघनित भी हो जाती है।  मेघालय के पूर्वी खासी हिल्स जिले में स्थि यह एक पृथ्वी का सबसे शांत स्थल है। बारिश की वजह से यहां खूब हरियाली रहती है। यहां मन को लुभाने वाले कई जलप्रपात भी मौजूद हैं। यहां विस्तारित मॉनसून अवधि के साथ एक उपोष्णकटिबंधीय जलवायु स्थितियां होती हैं। यहां घूमने वाले झरने, दिन-रात-रात स्थलों से अलग बनाता है। यह अपने शांत गांव, अद्भुत वनस्पतियों और जीवों के साथ यह आपका स्वागत करता है। माससिनाम में अद्वितीय माजिमबुविन गुफा देश की अद्वितीय गुफाओं में से एक है।

गुफा अपनी कलाकृतियों के लिए जानी जाती है - छत से निचली सतह पर प्रस्तुत सामग्री के संग्रह के कारण एक गुफा की निचली क्षैतिज सतह से विकसित चट्टान का एक गठन इसे अनोखा बनाता है। गुफा में कुछ स्लेथोथेम हैं जो शिवलिंग जैसा दिखते हैं। मासिनराम में लोग बेंत से बने छाते इस्तेमाल करते हैं। जिन्हें कनूप कहते हैं। कनूप को वे हमेशा साथ में रखते हैं ताकि शरीर हमेशा ढंका रहे और वो बारिश के दौरान भी लगातार काम करते रहें। मॉसिनराम का दौरा करना किसी के लिए रोमांचकारी अनुभव है, जो ऑफबीट गंतव्य पर जाने की इच्छा रखते है इनके लिए निसंन्देह मासिसिनम सबसे अच्छी मॉनसून जगहों में से एक हैं।

यात्रा का सर्वोत्तम समय: सितंबर से नवंबर तक का है। 
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