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भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

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भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

भारत एक ऐसा देश है जो सांस्कृतिक, समाजिक और ऐतिहासिक रुप से पूर्णतः संपन्न है। भारत में हर जाति, हर वर्ग के लोग रहते हैं यही कारण है कि इसे विविधता में एकता वाला देश भी कहा जाता है। भारत में यूं तो इसकी पहचान के लिए कई साक्ष्य उपलब्ध है लेकिन भारत की ऐतिहासिक कला का कोई सानी नहीं है। भारत में मुगल काल से लेकर ब्रिटिश काल तक, रामायण से लेकर महाभारत तक कं साक्ष्य मौजूद है जो भारत को ऐतिहासिक धरोहरों का देश बनाते हैं। भारत में विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और धर्मों का एक सम्मेलन है और यही हमें अद्वितीय बनाता है। देश की विविधता कि यह विशेषता है जो हर साल लाखों विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती है। देश की सांस्कृतिक विविधता और समृद्ध विरासत भारत को एक विशाल देश से गौवांतित करती है। भारत में ऐतिहासिक रुप से कई किले एवं स्मारक स्थित है। मंदिरों से लेकर किलों तक, महलों से लेकर संग्रहालयों तक यहां पर्यटकों के लिए एवं इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए बहुत कुछ निहित है।

भारत प्राचीन किलों और स्मारकों का एक देश है, जो अपनी गहरी प्रगति की अतीत का वर्णन करता है। प्राचीन भारतीय किलों में जल दुर्ग, गिरी दुर्ग और वन दुर्ग हैं है। तो वहीं स्मारकों में हुमांयु का मकबरा, शेरशांह सूरी का मकबारॉ, ताजमहल इत्यादि है। यही कारण है कि भारत का विश्व के उन देशों में शुमार है जो अपने अनूठे वास्तु के चलते हर साल देश दुनिया के लाखों पर्यटकों को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा है। आज यहां कई ऐसे स्मारक मौजूद हैं जिनको यदि आप ध्यान से देखें तो आपको भारत के गौरवशाली इतिहास का पता चल जायगा। भारत की धरती पर मौजूद ये ईमारत ऐसे हैं जिनको सिर्फ देखने मात्र से ही खुद-ब-खुद वाह निकल जायगा और आप अपने और अपनी धरोहरों पर गर्व करेंगे। भारत का प्रतिष्ठित वास्तुशिल्प वैभव अपने स्वर्ण अतीत की एक उत्तम मिसाल है। इतिहास के सम्राटों ने उन शास्त्रीय अवशेषों के रूप में अपने शासन की छाप छोड़ दी जो उनके राजा के बारे में बहुत कुछ बोलते हैं। यदि आप भारत में स्थित अलग-अलग स्मारकों पर गौर करें तो एक बात जो और सामने आती है वो यह है इन इमारतों की शैली, जिनमें अलग-अलग सभ्यताओं और संस्कृतियों की झलक देखने को मिलती है। भारत के प्रत्येक राज्य में कई ऐतिहासिक धरोंहरें स्थित है जो भारत के समृद्ध इतिहास का प्रमाण है। राजस्थान के किलों से लेकर दिल्ली के स्मारकों तक, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार, बंगाल आदि सभी जगह ऐतिहासिक स्थल निहित है। इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको भारत के कुछ ऐसे ही प्रसिद्ध किलों और स्मारको के बारे में बता रहे है जो अपनी कला और वास्तु की दृष्टि से राष्ट्र को आकर्षित करती हैं और लोगों के कौतहुल का केंद्र बनी हुई है।

भारत में शीर्ष स्मारक

लाल किला - दिल्ली

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पुरानी दिल्ली की सबसे प्रमुख इमारतों में से एक, लाल किला 200 से अधिक वर्षों से मुगल साम्राज्य का स्थल रहा है। इसे 16वें मुगल सम्राट शाहजहाँ की राजधानी शाहजहाँनाबाद के गढ़वाले महल के रूप में बनाया गया था। आज लाल किला दिल्ली का एक विश्व प्रसिद्ध किला है। इसका निर्माण तोमर राजा अनंगपाल ने 1060 में करवाया था। बाद में पृथ्वीराज चौहान ने इसे फिर से बनवाया और शाहजहां ने इसे तुर्क शैली में ढलवाया था। लाल बलुआ पत्थरों और प्राचीर के कारण इसे लाल किला कहा जाता है। भारत के लिए यह किला ऐतिहासिक महत्व रखता है। मुगल शासक, शाहजहां ने 11 वर्ष तक आगरा से शासन करने के बाद तय किया कि राजधानी को दिल्लीप लाया जाए और यहां 1618 में लाल किले की नींव रखी गई। वर्ष 1647 में इसका उद्घाटन हुआ। करीब डेढ़ मील में फैले इस किले के लाहौर और दिल्लीज गेट दो प्रवेश द्वार हैं। चूंकि यह शाही परिवार का निवास स्थान था, इसलिए इसे 'किला-ए-मुबारक' भी कहा जाता था। प्रत्येक वर्ष 15 अगस्त को भारत के प्रधानमंत्री मुख्य द्वार पर राष्ट्रीय ध्वज फहराते हैं। प्रत्येक शाम को एक साउंड और लाइट शो आयोजित किया जाता है। इसमें पूरे इतिहास को दर्शाया गया है और यह कई पर्यटकों का पसंदीदा स्थल है। यह दिल्ली के सबसे बड़े स्मारकों में से एक है जो हजारों घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है।

ताज महल - आगरा

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प्रेम का प्रतीक - ताजमहल दुनिया के सात अजूबों में से एक है। मुगल बादशाह शाहजहाँ द्वारा अपनी प्यारी पत्नी मुमताज महल की याद में बनवाया थायह मकबरा आगरा शहर के मध्य में स्थित है। इसे मुगल वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है। हर साल लाखों यात्री और पर्यटक इस प्रसिद्ध स्मारक को देखने आते हैं। इसे यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में भी शामिल किया गया है। ताजमहल भारतीय, पर्सियन और इस्लामिक वास्तुशिल्पीय शैली के मिश्रण का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण कार्य 1632 में शुरु हुआ था। 21 साल तक इसमें हजारों शिल्पकार, कारीगर और संगतराश ने काम किया और 1653 में ताजमहल बनकर तैयार हुआ। यहां स्थित मुमताज महल का मकबरा ताजमहल का मुख्य आकर्षण है। सफेद संगमरमर से बना यह मकबरा वर्गाकार नींव पर आधारित है। यह मेहराबरूपी गुंबद के नीचे है और यहां एक वक्राकार गेट के जरिए पहुंचा जा सकता है।

कुतुब मीनार - दिल्ली

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दिल्ली के क्षितिज में एक प्रसिद्ध स्मारक कुतुब मीनार है। इसे 1193 में कुतुब-उद-दीन ऐबक द्वारा बनाया गया था। यह पारंपरिक मुगल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। कुतुब मीनार को दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची इमारत भी माना जाता है जो ईंटों से बनी है। दिल्ली के महरौली इलाके में छत्तरपुर मंदिर के पास स्थित कुतुब मीनार की ऊंचाई करीब 73 मीटर है और इसमें पांच मंजिले हैं। ऐबक ने सिर्फ इसकी पहली मंजिल का निर्माण करवाया था, जबकि उनके बेटे ने इसकी तीन मंजिलें बनवाईं, जबकि 1368 में फिरोजशाह तुगलक ने पांचवीं और अंतिम मंजिल बनवाई। कुतुब मीनार का निर्माण लाल पत्थर और मार्बल से किया गया था। इसके अंदर गोल सीढ़ियां हैं। इस मीनार में पांच अलग-अलग मंजिले हैं, प्रत्येक को बेस पर 15 मीटर व्यास से लेकर शीर्ष पर सिर्फ 2.5 मीटर तक चिह्नित किया गया है। पहले तीन मंजिले लाल बलुआ पत्थर से बने हैं, चौथे और पांचवें मंजिले संगमरमर और बलुआ पत्थर से बने हैं। इसके अलावा परिसर में एक 7 मीटर ऊंचा लोहे का स्तंभ है जिसे अशोक स्तंभ के रूप में जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि आप इसे अपनी पीठ के माध्यम से खड़े होकर हाथों से घेर कर छू लेते हैं तो आपकी हर इच्छा पूरी हो जाएगी।

स्वर्ण मंदिर - अमृतसर

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स्वर्ण मंदिर को हरमंदिर साहिब के नाम से भी जाना जाता है। यह देश का एक प्रमुख तीर्थस्थल है और यहां पूरे साल बड़ी संख्या में श्रद्धालू आते हैं। यह देश के सबसे महत्वपूर्ण गुरुद्वारों में से एक है। इसे दरबार साहिब के नाम से भी जाना जाता है और 16 वीं शताब्दी में चौथे सिख गुरु, गुरु रामदास साहिब जी द्वारा इसका निर्माण किया गया था। 16वीं शताब्दी में 5वें सिक्ख गुरू, गुरू अर्जुन देव जी ने बनवाया था। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में महाराजा रणजीत सिंह ने इस गुरुद्वारे की ऊपरी छत को 400 किग्रा सोने के वर्क से ढंक दिया, जिससे इसका नाम स्वर्ण मंदिर पड़ा। यह 1604 में था जब गुरु अरुण ने आदि ग्रंथ को पूरा किया और गुरुद्वारा परिसर में इसे स्थापित किया। संगमरमर से बना यह दो तल्ला गुरुद्वारा अमृत सरोसर नाम के एक पवित्र तालाब से घिरा हुआ है। सिक्ख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को दिन के समय इसके पवित्र स्थान पर रखा जाता है। मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं, जो मानवीय भाईचारे और समानता का संदेश देते हैं। भले ही इस मंदिर का महत्व सिक्ख धर्म में हो, पर अमृतसर आने वाले भारतीय और विदेशी पर्यटक भी इससे दूर नहीं रह पाते हैं। सिख धर्म का सबसे पवित्र ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब गुरुद्वारे के अंदर हमेशा मौजूद रहता है। यह अमृतसर शहर के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है और देश और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से लोगों को आकर्षित करता है।

जामा मस्जिद - दिल्ली

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पुरानी दिल्ली में स्थित जामा मस्जिद देश की सबसे बड़ी मस्जिद है। मस्जिद का निर्माण महान मुगल शासक - शाहजहाँ ने 1644 से 1658 के बीच करवाया था। इसमें तीन महान द्वार, चार मीनारें और दो 40 मीटर ऊंची मीनारें हैं, जो लाल बलुआ पत्थर और सफेद संगमरमर की पट्टियों से निर्मित हैं। खंभे को पवित्र कुरान से छंद के साथ अंकित किया गया है। जामा मस्जिद अपने अंदर कई ऐतिहासिक घटनाओं और यादों को समेटे हुए है। इस मस्जिद को बनाने में 6 साल का समय और करीब 10 लाख रुपये लगे। यह मुगल कद और भव्यता का बेहतरीन नमूना है। यह राष्ट्रीय राजधानी का एक बहुत लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। जटिल नक्काशी, शानदार संरचना और विशिष्ट मुगल वास्तुकला मस्जिद का मुख्य आकर्षण हैं। मस्जिद का मुख्य आंगन 25, 000 भक्तों को समायोजित करने के लिए काफी बड़ा है। शक्तिशाली लाल किला, जामा मस्जिद के पूर्वी छोर पर स्थित है। जामा मस्जिद में प्रवेश करने के लिए उत्तर और दक्षिण द्वारों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि पूर्वी द्वार सिर्फ शुक्रवार को ही खुलता है। इस द्वार के बारे में प्रचलित है कि सुल्तान इसी द्वार के ज़रिए जामा मस्जिद में प्रवेश करते थे। जामा मस्जिद में 11 मेहराब हैं। बीच वाला मेहराब सबसे बड़ा है, जिसके ऊपर सफेद और काले संगमरमर से सजे गुंबद बने हैं।

हुमायूँ का मकबरा - दिल्ली

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मुगल वास्तुकला का एक चमकदार उदाहरण, हुमायूँ का मकबरा राष्ट्रीय राजधानी का एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण का केंद्र है। यह मकबरा हुमायूँ की मृत्यु के नौ साल बाद 1565 ई. में बनाया गया था। इस मकबरे को हुमायूँ की याद में उनकी पत्नी हामिदा बानो बेगम द्वारा ने सन् 1562 में बनवाना शुरू किया था जबकि संरचना का डिज़ाइन मीरक मिर्ज़ा घीयथ नामक पारसी वास्तुकार ने बनाया था। मकबरे को हुमायूँ की मृत्यु के नौ साल बाद बनवाया गया था। दिल्ली का हुमायूँ का मकबरा लोधी रोड और मथुरा रोड के बीच पूर्वी निज़ामुद्दीन के इलाके में स्थित एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण है और 1993 में इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में घोषित किया गया तथा भारत में मुगल स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह बगीचे युक्त मकबरा चारों तरफ से दीवारों से घिरा है जिसमें सुन्दर बगीचे, पानी के छोटी नहरें, फव्वारे, फुटपाथ और कई अन्य चीजें पाई जाती हैं। इस चहारदीवारी में कई अन्य मुगल शासकों की कब्रें हैं। मकबरे के चारों ओर बने बगीचे पारसी कला का अहसास कराते हैं। - हुमायूं के कब्र के पास ही बेगम हमीदा बानो की भी कब्र है। जब इस मकबरे का निर्माण किया गया तब यहां से यमुना साफ दिखाई देती थी। इस कारण यहां मकबरे का निर्माण किया गया था।

इंडिया गेट - दिल्ली

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इंडिया गेट राष्ट्रीय राजधानी की आत्मा की पहचान है। या यूं कहे कि दिल्ली की आत्मा इंडिया गेट है। बच्चों से लेकर बूढ़ें तक, सभी को इंडिया गेट के लॉन में एक शानदार शाम बिताना पसंद है। 42 मीटर ऊंचे इंडिया गेट में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए जान गंवाने वाले 70,000 भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि दी गई है। यह स्मारक 1919 के अफगान युद्ध में उत्तरपश्चिमी सीमा में मारे गए 13,516 से अधिक ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों के नाम पर निर्मित है। ये वे सैनिक थे जिन्होंने अंग्रेजी सेना की तरफ से विश्व युद्ध प्रथम एवं 1919 में तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में अपने जीवन का बलिदान दिया था। यह एक तोरणद्वार है, जो लाल भरतपुर पत्थर के बने एक निचले आधार पर स्थित है। इंडिया गेट का शिलान्यास 1921 में ड्यूक, कनॉट के रॉयल रॉयल हाईनेस द्वारा किया गया था और इसे एडविन लुटियन द्वारा डिजाइन किया गया था। भारत की आजादी के बाद अमर जवान ज्योति स्मारक का एक हिस्सा बन गया। 1971 के भारत - पाकिस्तान युद्ध में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले सैनिकों की देश को याद दिलाने के लिए मेहराब के नीचे अनन्त ज्योति दिन-रात जलती रहती है। आज भी दिल्ली के सभी मुख्य आकर्षणों में से पर्यटक, इंडिया गेट जाना सबसे ज्यादा पसंद करते हैं। दिल्ली के ह्रदय में स्थापित यह भारत के एक राष्ट्रीय स्मारक के रूप में शान से खड़ा है।

गेटवे ऑफ इंडिया - मुंबई

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मुंबई का नाम लेते ही हमांरे ज़हन में सर्वप्रथम नाम गेटवे ऑफ इंडिया की ही आता है। यह स्मारक हिंदू और मुस्लिम वास्तुकला का एक आदर्श मिश्रण है। मुंबई के कोलाबा में स्थित गेटवे ऑफ इंडिया वास्तुशिल्प का चमत्कार है और इसकी ऊँचाई लगभग आठ मंजिल के बराबर है। वास्तुकला के हिंदू और मुस्लिम दोनों प्रकारों को ध्यान में रखते हुए इसका निर्माण सन 1911 में राजा की यात्रा के स्मरण निमित्त किया गया। इसे 1911 की सर्दियों में दिल्ली दरबार के रास्ते में किंग जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी क्वीन मैरी की मुंबई यात्रा के लिए बनाया गया था। इंडो-सारासेनिक शैली में निर्मित, गेटवे ऑफ़ इंडिया की आधारशिला रखी गई थी। मुंबई बंदरगाह के पानी के किनारे पर स्थित, गेटवे ऑफ इंडिया एक भव्य और आकर्षक संरचना है। 26 मीटर ऊंची संरचना मुंबई शहर की पहचान बन गई है। पृष्ठभूमि में गेटवे ऑफ इंडिया के साथ आपकी एक फोटो खिंचवाएँ बिना मुंबई की यात्रा अधूरी है। गेटवे ऑफ इंडिया खरीददारों के स्वर्ग कॉज़वे और दक्षिण मुंबई के कुछ प्रसिद्द रेस्टारेंट जैसे बड़े मियाँ, कैफ़े मोंदेगर और प्रसिद्द कैफ़े लियोपोल्ड के निकट है।

एलोरा की गुफाएँ - औरंगाबाद

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महाराष्ट्र के औरंगाबाद से 29 किमी दूर स्थित शानदार एलोरा गुफाएँ विश्व प्रसिद्ध हैं। ये गुफाएँ एक विश्व धरोहर स्थल हैं और रॉक कट वास्तुकला का प्रतीक हैं। एलोरा विश्व में सबसे बड़े एकल कैलासा के महान एकल उत्खनन के लिए भी प्रसिद्ध है। एलोरा विशेष रूप से हिंदू, बौद्ध और जैन गुफा मंदिरों के लिए जाना जाता है जो 6वीं शताब्दी के हैं। गुफाओं की यात्रा करने का सबसे अच्छा समय मानसून के दौरान है। ठंडी हवा और यहाँ की जलधाराएँ गुफाओं की सुंदरता में चार चांद लगाती हैं। एलोरा का मूल नाम वेरुल है जो एक बहुत ही प्राचीन धरोहर है। यहां कुल 34 गुफाएं है। ये गुफाये हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के त्रिवेणी संगम को दर्शाती है। इन 34 गुफ़ाओं में से 17 गुफाएं हिन्दू धर्म की है जबकि 12 गुफाएं बौद्ध धर्म और 5 गुफाएं जैन धर्म की है। ये गुफाएं 600 ई से 1000 ई के कालखंड में अस्तित्व में आई।ये गुफाएं बेसाल्टिक चट्टानों को काटकर बनाई है जो 2 किमी की दूरी में फैले है।यह गुफाएं भारत की प्राचीन काल को दर्शाती है जो आज एक आश्चर्य है। एलोरा की गुफाओं का निर्माण राष्ट्रकूट राजाओंके काल मे किया। इन गुफाओं में कैलास गुफा बहुत प्रसिद्ध है इस मंदिर में भगवान शिवजी विराजमान है। यह मंदिर के रथ के आकार का है। लाखों सैलानी हर साल पूरी दुनिया से एलोरा की गुफाओं का इतिहास जानने के लिये आते है।

विक्टोरिया मेमोरियल - कोलकाता

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विक्टोरिया मेमोरियल कोलकाता की पहचान है। यह भारत में अंग्रेजी राज को दी गई एक श्रद्धांजलि है, इसे पुनः निर्मित किया गया था और यह ताजमहल पर आधारित था। यह वास्तुकला कोलकाता शहर के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है। इसे बनाने के पीछे यह लॉर्ड कर्जन का दिमाग था। यह शानदार स्मारक भारत की महारानी और महारानी विक्टोरिया के लिए उनकी मृत्यु के बाद बनाया गया था। स्मारक की आधारशिला 1906 में रखी गई थी। यह ब्रिटिश शाही परिवार, लघु चित्रों, तेल चित्रों, कलाकृतियों और अन्य वस्तुओं के कई चित्र रखता है। इसे आम जनता के लिए 1921 में खोला गया था, इसमें शाही परिवार की कुछ तस्वीरें भी हैं। इन बेशकीमती प्रदर्शन के अलावा पर्यटक विक्टोरिया मेमोरियल की ख़ूबसूरत संरचना को देखने यहाँ आते हैं। यह कोलकाता के सबसे मशहूर दर्शनीय स्थलों में से एक है। इस इमारत की रचना ब्रिटिश और मुग़ल दोनों शैलियों को मिलाकर की गयी थी। इसे इंडो सारासेनिक रिवाइवल आर्किटेक्चर (हिन्द- अरबी नव वास्तुकला) के नाम से भी जाना जाता है, जो वास्तुशिल्प की एक शैली है और इसे 19 वीं सदी में ब्रिटिश सरकार द्वारा उपयोग किया जाता था विक्टोरिया मेमोरियल में 25 गैलरियां हैं। इन गैलरियों में मूर्ति गैलरी, राजसी गैलरी, सेंट्रल हॉल, पोर्ट्रेट गैलरी, हथियार और शस्त्रागार गैलरी और कोलकाता गैलरी हैं। म्यूजियम के अन्य प्रदर्शनियों में पुराने ज़माने के सिक्कों, स्टैम्प्स और नक्शों की प्रदर्शनी लगी हुई हैं।

सिटी पैलेस - उदयपुर

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पिछोला झील के किनारे पर स्थित, सिटी पैलेस एक वास्तुकला की उत्कृष्ट कृति है। यह उदयपुर शहर के बेहतरीन महलों में से एक है। इसे लगभग 400 साल पहले बनाया गया था। यह वास्तव में राजस्थान राज्य का सबसे बड़ा महल परिसर है। मुगल और राजस्थानी वास्तुकला में एक पहाड़ी की चोटी पर बने इस महल से पूरे शहर और पिछोला झील का मनोरम दृश्य दिखाई देता है। महल का परिसर पूरी तरह से ग्रेनाइट और संगमरमर में बनाया गया है। अपने बालकनियों, टावरों और कपोलों के साथ महल परिसर के अंदरूनी हिस्से में नाजुक दर्पण-काम, संगमरमर का काम, भित्ति चित्र, चांदी के काम, चांदी के काम, जड़ना-काम और रंगीन कांच के बचे हुए प्रदर्शन होते हैं। उदयपुर में अवश्य जाना चाहिए। यह महल हर साल हजारों घरेलू और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को आकर्षित करता है। सिटी पैलेस के परिसर में 11 महलों शामिल हैं। महल में कई गुंबद, आंगन, गलियारे, कमरे, मंडप, टावरों, और हैंगिंग गार्डन हैं जो इसकी सुंदरता बढ़ाते हैं। इस महल में कई द्वार हैं। बड़ा पोल या ग्रेट गेट महल का मुख्य प्रवेश द्वार है। यहाँ एक भी त्रिधनुषाकार द्वार है, इसे त्रिपोलिया कहा जाता है। इस गेट के करीब एक क्षेत्र है, जहां हाथियों की लड़ाई होती थी। इन दो फाटकों के बीच में, वहाँ आठ तोरण या संगमरमर के मेहराब हैं। एंटीक फर्नीचर, सुंदर पेंटिंग, उल्लेखनीय दर्पण और सजावटी टाइल का काम महल के अंदरूनी हिस्से की शान बढ़ाते हैं। मणिक महल या रूबी पैलेस अद्भुत क्रिस्टल और चीनी मिट्टी के मूर्तियों के साथ सजी है। भीम विलास हिंदू देवी - देवता, राधा और कृष्ण के जीवन दर्शन के लघु चित्रों के साथ सजाया गया है।

चारमीनार - हैदराबाद

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चारमीनार हैदराबाद शहर का वैश्विक पहचान है। चारमीनार को मोहम्मद कुली कुतुब शाही ने 1591 में बनवाया था। आज इस ऐतिहासिक इमारत ने पूरे विश्व में चर्चा हासिल की है। चार मीनार का शाब्दिक अर्थ होता है- चार टॉवर है। यह मुसी नदी के पूर्वी तट पर स्थित है। चार मीनार के पश्चिम में बहुत लोकप्रिय लाड बाज़ार स्थित है। यह भव्य इमारत प्रचीन काल की उत्कृष्ट वास्तुशिल्प का बेहतरीन नमूना है। इस टॉवर में चार चमक-दमक वाली मीनारें हैं, जो कि चार मेहराब से जुड़ी हुई हैं। मेहराब मीनार को सहारा भी देता है। जब कुली कुतुब शाही ने गोलकुंडा के स्थान पर हैदराबाद को नई राजधानी बनाया, तब चारमीनार का निर्माण करवाया गया था। उन्होंने हैदराबाद शहर में प्लेग के अंत को चिह्नित करने के लिए चारमीनार का निर्माण किया। एक छोटी सी मस्जिद चारमीनार की सबसे ऊपरी मंजिल को सजाती है। यह मस्जिद मुस्लिमों के पवित्र शहर मक्का के सामने चारमीनार की पश्चिमी ओर स्थित है। यह भी माना जाता है कि यह हैदराबाद शहर की सबसे पुरानी जीवित मस्जिद है।

आमेर का किला - जयपुर

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आमेर का किला मूल रूप से राजा मान सिंह द्वारा 1592 में बनाया गया था और बाद में सवाई जय सिंह द्वारा विकसित किया गया था। आमेर किला न सिर्फ जयपुर बल्कि पूरे राजस्थान के सबसे प्रसिद्ध पर्यट स्थलों में से एक है। लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बने इस किले में चार मंजिले हैं। हर मंजिल पर अलग आंगन हैं। यह किला जयपुर से सिर्फ 1 किमी दूर, आमेर के छोटे से शहर में स्थित है। एक पहाड़ी पर उच्च स्थित, एम्बर किला संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर में बनाया गया है। यह क्षेत्र के शाही अतीत का उदाहरण है। हालांकि बाहरी हिस्सों में बीहड़ रूप है, लेकिन किले के अंदरूनी हिस्से अभी भी शानदार आकार में हैं। यह सही कहा जा सकता है कि अंबर किला जयपुर की अनूठी पहचान का एक अभिन्न अंग है। माना जाता है कि इसका निर्माण असल में मीणाओं ने करवाया था जिस पर बाद में राजा मानसिंह प्रथम ने राज किया। यह किला कलात्मक हिंदू वास्तुशैली के लिए जाना जाता है। इस किले में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, शीश महल (दर्पण महल), जय मंदिर और सुख निवास शामिल हैं जहां किले में मौजूद पानी पर से होकर हवा जब अंदर आती है तो कृत्रिम रूप से ठंडा वातावरण बन जाता है। इस किले को देखने के लिए न सिर्फ देश बल्कि दुनियाभर के पर्यटक आते हैं।

सूर्य मंदिर - कोणार्क

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ओडिशा के कोणार्क में स्थित सूर्य मंदिरॉ 13 वीं शताब्दी में निर्मित किया गया था यह स्मारक एक विश्व धरोहर स्थल के रुप में आज विख्यात है। यह एक सूर्य मंदिर है जिसे ब्लैक पैगोडा भी कहा जाता है। 1250 के आसपास पूर्वी गंगा राजवंश के राजा नरसिंहदेव प्रथम द्वारा निर्मित, मंदिर एक सजावटी रथ के आकार में है। हालांकि मंदिर परिसर का एक बड़ा हिस्सा अब खंडहर में है, लेकिन यह अभी भी चालाकी और श्रेष्ठ वास्तुकला का एक स्थायी उदाहरण है। मंदिर की कल्पना एक विशाल सौर रथ के रूप में की गई थी, जिसमें बारह जोड़ी घोड़े थे, जो कि सात रियरिंग घोड़ों द्वारा खींचे गए थे। मंदिर को नाविकों से ब्लैक पैगोडा का नाम मिला क्योंकि यह उनके लिए एक संदर्भ था। यह मंदिर बहुत बडे रथ के आकार में बना हुआ है, जिसमे कीमती धातुओ के पहिये, पिल्लर और दीवारे बनी है। मंदिर का मुख्य भाग आज विनाश की कगार पर है। सुपरिष्कृत रूप से इस रथ में धातुओ से बने चक्कों की 12 जोड़िया है जो 3 मीटर चौड़ी है और जिसके सामने कुल 7 घोड़े है। इस मंदिर की रचना भी पारंपरिक कलिंगा प्रणाली के अनुसार ही की गयी है। और इस मंदिर को पूर्व दिशा की ओर या तरह बनाया गया है की सूरज की पहली किरण सीधे मंदिर के प्रवेश पर ही गिरे। खोंदालिट पत्थरो से ही इस मंदिर का निर्माण किया गया था। कोणार्क मंदिर अपनी कामोत्तेजक मूर्तिवश मैथुन के लिये भी जाना जाता है।

फलकनुमा पैलेस - हैदराबाद

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देश के सबसे बेहतरीन महलों में से एक, फलकनुमा पैलेस को श्रेणीबद्ध किया गया है। फलकनुमा पैलेस चारमीनार से सिर्फ 5 किमी की दूरी पर है। फलकनुमा का हिंदी में मतलब है 'आसमान की तरह' है। इस महल को नवाब वकार उल उमर ने बनवाया था जो हैदराबाद के प्रधानमंत्री थे। और इसे बनने में पूरे 9 साल का वक्त लगा था। महल की रचना सर बाइकर द्वारा की गई थी जो एक अंग्रेजी शिल्पकार थे। बनने के कुछ समय बाद तक उन्होंने महल को अपने निवास स्थान के तौर पर इस्तेमाल किया था। बाद में सन् 1897-98 में इसे हैदराबाद के निज़ाम को सौंप दिया गया। 32 एकड़ क्षेत्र में फैला, यह संपत्ति इतालवी और ट्यूडर वास्तुकला का एक दुर्लभ मिश्रण है। सना हुआ ग्लास खिड़कियां कमरों में रंग का एक स्पेक्ट्रम फेंकती हैं। हरे-भरे बगीचे, राजसी वास्तुकला और भव्यता इस क्षेत्र के समृद्ध अतीत के बारे में बात करते हैं। साल 2000 तक ये महल निज़ाम फैमिली की संपत्ति का हिस्सा था जिसे बाद में ताज होटल को सौंप दिया गया। अब इसकी देखरेख का पूरा जिम्मा इनका है। फाइव स्टार लक्जरी होटल में तब्दील हो चुका ये महल 32 एकड़ में फैला हुआ है। राजा-महाराजाओं के समय में यहां जनता दरबार लगता था। साथ ही ये महल उस समय में होने वाले शानदार जश्नों का भी गवाह है। महल में कुल 22 हॉल और 60 कमरे हैं। यहां के डाइनिंग हॉल दुनिया का सबसे बड़ा डाइनिंग हॉल है जिसमें एक साथ 101 लोग बैठकर खाना खा सकते हैं। महल के अंदर की कारीगरी इतनी शानदार है जिसका अंदाजा आपको यहां आने के बाद ही लगेगा। महल की दीवारों को ब्रोकेड से सजाया गया है तो वहीं इसमें इस्तेमाल किए गए मार्बल्स इटालियन हैं। इस महल में 101 सीटों वाला डाइनिंग हॉल है, जिसे दुनिया में सबसे बड़ा माना जाता है।

उज्जयन्ता पैलेस - अगरतला

भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

उज्जयंत पैलेस त्रिपुरा का शाही महल है और राज्य की राजधानी अगरतला में स्थित है। ऐसा माना जाता है कि महल का नाम रबींद्रनाथ टैगोर ने दिया था। इसका निर्माण 1899 और 1901 के बीच त्रिपुरा के राजा, महाराजा राधा किशोर माणिक्य द्वारा किया गया था। सफेद संगमरमर से चमकता हुआ ये महल राजधानी अगरतला में स्थित है। महल का निर्माण भले ही काफी सालों पहले हुआ है लेकिन इसकी खूबसूरती आज भी वैसी ही बरकरार है। सन् 1901 में राजा राधाकिशोर माणिक्य द्वारा महल का निर्माण कराया गया था। इंडो-ग्रीक स्टाइल में बने इस महल के आसपास कई सारे छोटे-छोटे बाग-बगीचे और मंदिर भी हैं, जिनमें लक्ष्मी नारायण, उमा-माहेश्वरी, काली और जगन्नाथ मंदिर प्रमुख हैं। हालांकि अब इस महल का इस्तेमाल कुछ समय तक राज्य की विधानसभा की बैठकों के लिए किया जाता है लेकिन अब टूरिस्टों के लिए इसे म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया गया है। जो नॉर्थ-ईस्ट इंडिया का सबसे बड़ा म्यूज़ियम है। 800 एकड़ में फैले इस महल में सिंहासन रूम, दरबार हॉल, लाइब्रेरी और रिसेप्शन हॉल है। इस महल को एलेक्जेंडर मार्टिन ने डिज़ाइन किया था। महल में अलग-अलग जगहों का आर्किटेक्चर देखने को मिलता है। महल में तीन ऊंची गुंबदें हैं। सबसे ऊंचे गुंबद की ऊंचाई 86 फीट है। महल की खूबसूरती बढ़ाने का काम करते हैं म्यूज़िकल फाउंटेन, जो मुख्य द्वार पर लगे हैं। कहा जाता है उस समय इसे बनवाने में लगभग 10 लाख रूपए खर्च हुए थे। यह संग्रहालय पूर्वोत्तर भारत में रहने वाले विभिन्न समुदायों के रीति-रिवाजों और प्रथाओं के बगल में जीवन शैली, कला, संस्कृति, परंपरा और उपयोगिता शिल्प को प्रदर्शित करता है। यह उत्तर पूर्व भारत का सबसे बड़ा महल है और जब आप इस क्षेत्र में जाएं तो आपको इसे अवश्य देखना चाहिए।

खजुराहो स्मारक - खजुराहो

भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

खजुराहो, मध्य प्रदेश राज्य में स्थित प्रमुख शहर है, जो अपने प्राचीन एवं मध्यकालीन मंदिरों के लिये विश्वविख्यात है। खजुराहो मंदिर की आश्चर्यजनक वास्तुकला और कामुक मूर्तियां पर्यटकों का ध्यान अपनी और खिंचती हैं। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूचि में शामिल यह मंदिर मध्य प्रदेश के छत्तरपुर जिले में स्थित है। खजुराहो, भारतीय आर्य स्थापत्य और वास्तुकला की एक नायाब मिसाल है। खजुराहो स्मारक मध्य प्रदेश में हिंदू और जैन मंदिरों का एक समूह है जो लाखों घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करता है। मंदिर एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हैं। मंदिर हिंदू धर्म और जैन धर्म दोनों को स्वीकार करते हैं। मंदिरों का एक बड़ा हिस्सा 950 और 1050 ईस्वी के बीच बनाया गया था। मंदिरों का मुख्य विवरण, प्राचीन कला और मूर्तियों की अभिव्यक्ति मुख्य आकर्षण हैं। वे अपने नागर शैली के स्थापत्य प्रतीक और कामुक मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि 12 वीं शताब्दी तक 85 से अधिक मंदिर थे। आज उनमें से केवल 20 ही बचे हैं। सामान्य रूप से यहां के मंदिर बलुआ पत्थर से निर्मित किए गए हैं, लेकिन चौंसठ योगिनी, ब्रह्मा तथा ललगुआँ महादेव मंदिर ग्रेनाइट (कणाष्म) से निर्मित हैं। ये मंदिर शैव, वैष्णव तथा जैन संप्रदायों से सम्बंधित हैं। यहां की प्रतिमाऐं विभिन्न भागों में विभाजित की गई हैं। जिनमें प्रमुख प्रतिमा परिवार, देवता एवं देवी-देवता, अप्सरा, विविध प्रतिमाऐं, जिनमें मिथुन (सम्भोगरत) प्रतिमाऐं भी शामिल हैं यहां मंदिरों में जड़ी हुई मिथुन प्रतिमाऐं सर्वोत्तम शिल्प की परिचायक हैं, जो कि दर्शकों की भावनाओं को अत्यंत उद्वेलित व आकर्शित करती हैं और अपनी मूर्तिकला के लिए विशेष उल्लेखनीय हैं। खजुराहो की मूर्तियों की सबसे अहम और महत्त्वपूर्ण ख़ूबी यह है कि इनमें गति है,

मैसूर पैलेस - मैसूर

भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

मैसूर पैलेस जिसे अम्बा विलास पैलेस के नाम से भी जाना जाता है, दक्षिण भारत के सबसे प्रमुख महलों में से एक है। मैसूर शहर में स्थित है जिसे महलों के शहर के रूप में भी जाना जाता है, यह एक शानदार महल है। इस महल का निर्माण पुराने लकड़ी के महल के स्थाकन पर 1912 में वोडेयार के 24वें राजा द्वारा कराया गया था, जो वर्ष 1897 में टूट गया था। इस महल में इंडो-सारासेनिक, द्रविडियन, रोमन और ओरिएंटल शैली का वास्तुशिल्प देखने को मिलता है। इस तीन तल्ले महल के निर्माण में निर्माण के लिए भूरे ग्रेनाइट, जिसमें तीन गुलाबी संगमरमर के गुंबद होते हैं, का सहारा लिया गया है। महल के साथ-साथ यहां 44।2 मीटर ऊंचा एक पांच तल्ला टावर भी है, जिसके गुंबद को सोने से बनाया गया है। यह महल विश्व के सर्वाधिक घूमे जाने वाले स्थलों में से एक है। इसका प्रमाण इस बात से भी मिलता है कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे विश्व के 31 अवश्य घूमे जाने वाले स्थानों में रखा है।
महल, वोड्यार का आधिकारिक निवास और सीट है - मैसूर के महाराजाओं का पूर्व राजपरिवार, जिन्होंने मैसूर की रियासत पर 1399 से 1950 तक शासन किया। महल के परिसर में दो औपचारिक हॉल, आंगन, बगीचे और छोटी इमारतें हैं। इस महल में इंडो-सारासेनिक, द्रविडियन, रोमन और ओरिएंटल शैली का वास्तुशिल्प देखने को मिलता है। इस तीन तल्ले महल के निर्माण में निर्माण के लिए भूरे ग्रेनाइट, जिसमें तीन गुलाबी संगमरमर के गुंबद होते हैं, का सहारा लियागया है। महल के साथ-साथ यहां 44।2 मीटर ऊंचा एक पांच तल्ला टावर भी है, जिसके गुंबद को सोने से बनाया गया है। यह ताजमहल के बाद देश के सबसे अधिक देखे जाने वाले स्मारकों में से एक है और अनुमानित 3 मिलियन लोग सालाना इसे देखने आते हैं।

ग्वालियर का किला - ग्वालियर

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देश के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक, ग्वालियर का किला या ग्वालियर किला, मध्य प्रदेश के ग्वालियर में स्थित है। इसमें एक रक्षात्मक संरचना और दो मुख्य महल, गुर्जरी महल और मैन मंदिर शामिल हैं। 3 किमी के क्षेत्र में फैला, यह बलुआ पत्थर की दीवारों से घिरा हुआ है। किले का निर्माण मान सिंह तोमर ने 15 वीं शताब्दी में करवाया था। आज यह किला एक पुरातत्व संग्रहालय है। ग्वालियर किले में तीन मंदिर, छह महल और कई पानी की टंकियां हैं। सुंदर स्थापत्य कला, दीवारों और प्राचीरों पर बेहतरीन नक्काशी, रंग-रोगन और शिल्पकारी की वजह से यह किला बेहद खूबसूरत दिखाई देता है। यह गोपांचल पर्वत पर बना है। लाल बलुए पत्थर से बना। इस किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने मौजूद हैं। 15वीं शताब्दी में बना गूजरी महल उनमें से एक है जो राजा मानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी के प्रेम का प्रतीक है। यह मैदानी क्षेत्र से 100 मीटर ऊंचाई पर है। किले की बाहरी दीवार लगभग 2 मील लंबी है और इसकी चौड़ाई एक किलोमीटर से लेकर 200 मीटर तक है

गोलकोंडा किला - हैदराबाद

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हैदराबाद शहर से सिर्फ 11 किमी दूर स्थित, गोलकुंडा एक खंडहर किला है। पूरे परिसर में चार किले, आठ द्वार और बड़ी संख्या में मंदिर, मस्जिद और अस्तबल हैं। 87 अर्ध-वृत्ताकार गढ़ों से टूटी हुई 17 से 34 फीट की दीवारों के साथ, कुछ 60 फीट की ऊंचाई तक पहुंच गई, और 400 फीट ऊंची एक ग्रेनाइट पहाड़ी पर बनी, यह भारत के सबसे शानदार किले परिसरों में से एक बनी हुई है। पूरा किला 11 किमी में फैला हुआ है। आज, लगभग 800 वर्षों के बाद भी, किला अभी भी हैदराबाद के सबसे महान वास्तुशिल्प आश्चर्यों में से एक है। इसे भव्यता और सुंदर संरचना के कारण जाना जाता है। इस दुर्ग का निर्माण वारंगल के राजा ने 14वीं शताब्दी में कराया था। बाद में यह बहमनी राजाओं के हाथ में चला गया और मुहम्मदनगर कहलाने लगा। 1512 ई। में यह कुतुबशाही राजाओं के अधिकार में आया। फिर 1687 ई। में इसे औरंगजेब ने जीत लिया। ग्रेनाइट की एक पहाड़ी पर बने इस किले में कुल आठ दरवाजे हैं। यह पत्थर की तीन मील लंबी मजबूत दीवार से घिरा है। मूसी नदी इसके दक्षिण में बहती है। दुर्ग से लगभग आधा मील दूर उत्तर में कुतबशाही राजाओं के ग्रेनाइट पत्थर के मकबरे हैं जो टूटी-फूटी अवस्था में अब भी मौजूद हैं। आज भी हजारों की संख्या में पर्यटकों का यहां जमावड़ा देखा जा सकता है।

कुंभलगढ़ का किला - राजस्थान

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राजपुताना इमारतों के बारे में बात हो और आप कुंभलगढ़ किले के बारे में ना सोचें ऐसा हो ही नहीं सकता। कुंभलगढ़ का किला भारत के सबसे बड़े किलों में से एक है। कुंभलगढ़ महाराणा प्रताप की जन्मस्थली है। यह चित्तौड़गढ़ किले के बाद मेवाड़ में सबसे अधिक मांग वाला किला है। किले की दीवार 36 किमी तक फैली हुई है, जो इसे 'ग्रेट वॉल ऑफ चाइना' के बाद दूसरी सबसे बड़ी दीवार बनाती है। किला सूर्यास्त के बाद प्रत्येक दिन थोड़ी देर के लिए जलाया जाता है और उस दृश्य को याद नहीं करना चाहिए। किले की सुंदरता और भव्यता राजस्थान के समृद्ध अतीत और संस्कृति के बारे में बात करती है। यह किला एक विश्व धरोहर स्थल है और यूनेस्को द्वारा राजस्थान के हिल फॉर्ट्स में शामिल किया गया है। किले का निर्माण राणा कुंभा ने 15 वीं शताब्दी के दौरान करवाया था। इस किले की दो खासियत हैं - पहली इस किले की दीवार विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है जो की 36 किलो मीटर लम्बी है तथा 15 फीट चौड़ी है, इतनी चौड़ी की इस पर एक साथ पांच घोड़े दौड़ सकते है। दूसरी विशेषता है कि इस दुर्ग के अंदर 360 से ज्यादा मंदिर हैं जिनमे से 300 प्राचीन जैन मंदिर और बाकि हिंदू मंदिर हैं। यह एक अभेध किला है जिसे दुश्मन कभी अपने बल पर नहीं जीत पाया। इस किले की ऊंचे जगहों पर महल, मंदिर और रहने के लिए इमारते बनाई गईं। यहां समतल भूमि का उपयोग कृषि के लिए किया गया वही ढलान वाले भागों का इस्तेमाल जलाशयों के लिए करके इस दुर्ग को पूरी तरह सक्षम बनाया गया।

हवा महल- राजस्थान

भारत के प्रसिद्ध स्मारक और किले

हवा महल जयपुर की पहचान का एक अभिन्न हिस्सा है। यह वास्तव में गुलाबी शहर के सबसे लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है। हवा महल का शाब्दिक अर्थ हवाओं का स्थल है। यह एक उच्च स्क्रीन की दीवार है जिसे शाही परिवार की महिलाओं के लिए बनाया गया था। यह महल लाल और गुलाबी बलुआ पत्थर से बना है और सिटी पैलेस के किनारे पर स्थित है। इसका निर्माण 1799 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने करवाया था। महल की अद्वितीय 5 मंजिला संरचना मधुमक्खी के छत्ते के समान दिखती है। संरचना अपने आधार से 50 मीटर ऊपर उठती है। कई झरोखे या खिड़कियां संरचना का मुख्य आकर्षण हैं। जटिल विस्तार के साथ 953 से अधिक छोटी खिड़कियां हैं जिन्हें झरोखा कहा जाता है और इन झरोखो को बारीक़ कलाकृतियों से सजाया भी गया है। हवा के सामने की तरफ कोई प्रवेश द्वार नही है। यदि आपको अंदर जाना है तो आपको पिछले भाग से जाना होंगा। यह महल सफलता से अपनी जगह पर 87 डिग्री के एंगल में खड़ा है। इस महल को बनाने का उद्देश्य शाही महिलाओ को बाज़ार और महल के बाहर हो रहे उत्सवो को दिखाना था।

बृहदेश्वर मंदिर - तमिलनाडु

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बृहदेश्वर मंदिर एक हिंदू मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। यह तमिलनाडु राज्य के खूबसूरत शहर तंजावुर में स्थित है। यह भारत के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण सम्राट राजा चोल प्रथम द्वारा करवाया गया था और निर्माण 1010 ईस्वी में पूरा हुआ था। इसे राजराजेश्वर मंदिर, पेरिया कोविल और बिग मंदिर भी कहा जाता है। यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों का एक हिस्सा है और इसे 'ग्रेट लिविंग चोल मंदिर' के नाम से जाना जाता है। पूरे मंदिर का निर्माण बेहतर गुणवत्ता वाले ग्रेनाइट में किया गया है। यह मंदिर चोल शासकों की महान कला केंद्र रहा है। बृहदेश्वर मंदिर वास्तुकला, पाषाण व ताम्र में शिल्पांकन, चित्रांकन, नृत्य, संगीत, आभूषण एवं उत्कीर्णकला का बेजोड़ नमूना है। इस भव्य मंदिर को सन1987 में यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया। भगवान शिव को समर्पित बृहदेश्वर मंदिर शैव धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र स्थल रहा है। राजाराज चोल प्रथम ने 1010 एडी में इस मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर उनके शासनकाल की गरिमा का श्रेष्ठ उदाहरण है। मंदिर परिसर क्षेत्र के गौरवशाली अतीत का एक बेहतरीन उदाहरण है। मंदिर की मीनार 216 फीट ऊंची है। यह दुनिया के सबसे ऊंचे मंदिरों में से एक है। प्रवेश द्वार पर नंदी की विशाल प्रतिमा है। मूर्ति को एक ही पत्थर से तराशा गया है। इस पूरे मंदिर के ढाँचे को तैयार करने में केवल ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया था। ऐसा माना जाता है कि बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण करने के लिए 130,000 टन ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया था। मंदिर के इस मीनार की ऊँचाई 216 फुट है और ऐसी संरचनाओं के बीच, यह दुनिया में सबसे ऊँचा मंदिर है।

साँची का स्तूप - मध्यप्रदेश

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सांची स्तूप भारत की सबसे पुरानी पत्थर की संरचनाओं में से एक है। यह हमारे देश में सबसे प्रसिद्ध बौद्ध स्मारकों में से एक है। सांची में कई बौद्ध स्मारक हैं, लेकिन सांची स्तूप सबसे प्रसिद्ध है। ये स्मारक तीसरी और 12 वीं शताब्दी के हैं। सांची को अब यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थलों के तहत सूचीबद्ध किया गया है। आकर्षण साँची स्तूप एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है जो भोपाल शहर से लगभग 46 किमी दूर मध्यप्रदेश के साँची गाँव में स्थित है। यहाँ तीन स्तूप हैं और ये देश के सर्वाधिक संरक्षित स्तूपों में से एक हैं। पहले साँची स्तूप का निर्माण तीसरी शताब्दी में हुआ था। इसकी उंचाई लगभग 16.4 मीटर है और इसका व्यास 36.5 मीटर है। दूसरे स्तूप का निर्माण दूसरी शताब्दी में हुआ था और यह एक कृत्रिम मंच के ऊपर एक पहाड़ी की सीमा पर स्थित है। तीसरा साँची स्तूप पहले साँची स्तूप के पास स्थित है और इसमें अर्धवृत्ताकार गुंबद के ऊपर एक मुकुट है जिसे एक बहुत पवित्र स्थान माना जाता है। माना जाता है कि सांची के सभी स्तूपों के पीछे सम्राट अशोक का दिमाग था। ये स्मारक भगवान बुद्ध को समर्पित हैं। सांची स्तूप को एक अर्ध-गोलाकार चट्टान से उकेरा गया है और यह भगवान बुद्ध के अवशेषों का घर है। गुंबद के आकार की संरचना 16.5 मीटर लंबी और 36 मीटर व्यास की है। जटिल वास्तुकला के साथ स्तूप का प्रवेश द्वार भी संरचना का मुख्य आकर्षण है। सांची स्तूप एक विशाल अर्ध-परिपत्र, गुंबद के आकार का कक्ष है I जिसमें भगवान बुद्ध के अवशेषों को शांतता से दर्शाया है। यह ईंट से निर्माण किया गया है, इस पर तीसरी शताब्दी के ए.डी के समय की तारीखें दिखाई गयी है। साँची के सभी तीन स्तूप विश्व विरासत स्थल के रूप में माने जाते हैं और वर्तमान में यूनेस्को के अंतर्गत आते हैं।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर- तमिलनाडु

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तमिलनाडु में सबसे प्रसिद्ध मंदिरों और स्थानों में से एक, मीनाक्षी अम्मन मंदिर एक वास्तुशिल्प चमत्कार है। यह मंदिर देवी पार्वती (जिन्हें मीनाक्षी के रूप में भी जाना जाता है) और उनके आराध्य भगवान शिव को समर्पित है। यह तिरुपति के बाद दक्षिणी भारत में सबसे अधिक देखे जाने वाले मंदिरों में से एक है। वास्तुकला और विस्तृत नक्काशी मंदिर का मुख्य आकर्षण है। मंदिर में 14 गोपुरम (गेटवे टॉवर) हैं, जिनकी सीमा 45 से 50 मीटर के बीच है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर में अनुमानित 33,000 मूर्तियां रखी गई हैं। मीनाक्षी अम्मन मंदिर का केंद्रीय तीर्थस्थल और उसका कंसर्ट सुंदरेश्वर तीन बाड़ों से घिरा हुआ है। प्रत्येक विशेष परिक्षेत्र में चार छोटे टॉवर हैं। मंदिर में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण त्योहार मीनाक्षी थिरुकल्याणम , 'मीनाक्षी की शादी' है। यह त्योहार प्रत्येक वर्ष अप्रैल में मनाया जाता है। इस विशाल भव्य मंदिर का स्थापत्य एवं वास्तु भी काफी रोचक है। जिस करण माँ का यह मंदिर को सात अजूबों में नामांकित किया गया है। इस इमारत में 12 भव्य गोपुरम है, जिन पर महीन चित्रकारी की है। इस मंदिर का विस्तार से वर्णन तमिल साहित्य में प्रचीन काल से होता आया है। वर्तमान में जो मंदिर है यह 17वीं शताब्दी में बनवाया गया था। मंदिर में आठ खंभो पर आठ लक्ष्मीजी की मूर्तियां अंकित हैं। इन पर भगवान शंकर की पौराणिक कथाएं उत्कीर्ण हैं। यह मंदिर मीनाक्षी या मछली के आकार की आंख वाली देवी को समर्पित है। मछली पांड्य राजाओं को राजचिह्न है।

भारत में स्मारकों की राज्यवार सूची


दिल्ली में स्मारक

जंतर मंतर
दिल्ली गेट
मोती मस्जिद
पुराना किला - दिल्ली
सफदरजंग मकबरा
अग्रसेन की बावली
अमीर खुसरो का मकबरा
निज़ामुद्दीन औलिया का मकबरा
लोदी मकबरा
खान-ए-खानन मकबरा
काल गुम्बद
वजीराबाद मकबरा
शीश महल
अशोक स्तंभ
मिर्ज़ा ग़ालिब का मकबरा
सिकंदर लोधी का मकबरा
नील मस्जिद
तुगलकाबाद का किला


गोवा में स्मारक

से ’कैथेड्रल
बेसिलिका ऑफ बोम जीसस
चैपल ऑफ सेंट कजेटन
चैपल ऑफ सेंट कैथरीन
चर्च एंड कॉन्वेंट ऑफ सेंट फ्रांसिस असीसी
सेंट ऑगस्टीन टॉवर
वाइसराय का आर्क
महालक्ष्मी मंदिर
रीस मैगोस का किला
सफ़ा मस्जिद
अगुआड़ा किला
महाला
चर्च



आंध्र प्रदेश में स्मारक

बोर्रा गुफाएं
बेलम गुफाएं
चौमहल्ला पैलेस
भोंगीर का किला
सेंट मार्क कैथेड्रल
जामा मस्जिद
सेंट मैरी बेसिलिका चर्च
पुराणी हवेली
पगहा मकबरा
मेयो हॉल


गुजरात में स्मारक

दरभानगढ़
अहमदाबाद में जामा मस्जिद
नगीना मस्जिद
कालिका माता मंदिर
अशोकन रॉक
रुक्मिणी मंदिर
जैन मंदिर
तलजा गुफाएँ
सहर की मस्जिद
कदई डूंगर गुफाएं
दरभंगा का किला
केवड़ा मस्जिद
उपरकोट किला


जम्मू और कश्मीर में स्मारक

जामा मस्जिद
हजरतबल मस्जिद
हरि परबत किला
शंकराचार्य मंदिर
लेह पैलेस
शांति स्तूप
बाग़-ए-बहू क़िला और बाग़
मुगल गार्डन
अमर महल पैलेस
शे मठ


पश्चिम बंगाल में स्मारक

हावड़ा ब्रिज
शहीद मीनार
राजभवन
सेंट पॉल कैथेड्रल
हज़ार्डियरी पैलेस
कोलकाता उच्च न्यायालय
लेखक की इमारत
फोर्ट विलियम


राजस्थान में स्मारक

जयगढ़ का किला
जल महल
जंतर मंतर
जग मंदिर पैलेस
लेक पैलेस
जूनागढ़ का किला
लालगढ़ पैलेस
मेहरानगढ़ का किला
जसवंत थड़ा
चित्तौड़गढ़ किला
जैसलमेर का किला
तागारगढ़ किला


तमिलनाड़ू के स्मारक

विवेकानंद रॉक मैमोरियल
मीनाक्षी मंदिर
महाबलिपुरम रथ
सुनामी मैमोरियल
कैलासनाथ मंदिर
गांधी मैमोरियल
चेंजी किला
संतोम कैथरल बासिलिका
तंजावुर रॉयल पैलेस


केरल के स्मारक

पदमनाभापुरम पैलेस
मत्तांचरी पैलेस
अंजेंगो किला
होलगट्टी पैलेस
तिपु किला
बैकल किला
बोलगत्ती पैलेस
अरक्कली पैलेस
किलीमानुर पैलेस


मध्य प्रदेश के स्मारक

जल विलास पैलेस
चंदेरी किला
जहाज महल उर्चा
राम घाट उज्जेन
होंशाग शाह का मकबरा
भीमबेटका गुफाएं
घर किला
लाल बाग पैलेस


बिहार के स्मारक

शेर साह सुरी का मकबरा
रोहतासगढ किला सासराम


महाराष्ट्र के स्मारक

अगा खां प्लेस
केसारी वड़ा
चांद मीनार
लाल महल
छत्रपति शिवाजी टर्मिनल
बीबी का मकबरा
बॉम्बे उच्च न्यायालय



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