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भारत में मुगलकालीन वास्तुकला

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भारत में मुगलकालीन वास्तुकला


भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

भारत एक ऐतिहासिक भूमि है जहां इतिहास से जुड़ी कई इमारतें, कई साक्ष्य मौजूद है। भारत में समय के साथ-साथ शासन और शासक भी बदलते रहे हैं। जिन्होंने भारत में आकर यहां पर शासन किया और यहीं के हो कर रह गए। भारत के इन शासको ने भारत से काफी कुछ लेने के साथ भारत को काफी कुछ दिया भी है। महाभारत, रामायण के काल से लेकर, मध्य में राजपूतो, बादशाहों और आधुनिक काल में अग्रेंजी शासन तक ने भारत की संस्कृति, सभ्यता और उसकी ऐतिहासिक विरासतों को बनाने में अहम भूमिका निभाई है। लेकिन इन सभी शासकों और कालों में भारत की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर सबसे अहम रोल मुगलकालीन शासकों ने अदा किया है। जिन्होने भारत पर सबसे लंबे समय तक शासन किया। मुगल कालिन बादशाहों और शहंशाहों ने भारत को वास्तुकला के कई साक्ष्य उपलब्ध कराएं हैं जो आज के समय में भारत की मूल पहचान के गवाह है। मुगल कालिन वास्तुकला के बारे में जब हम सुनते हैं तो हमारे सामने विशाल भवन, इमारतें, किले, विसाल गेट, विशाल हॉल, कमरे, और मिनारें नजर आती हैं। मुगल शासन ने भारत में वास्तुकला, मस्जिदों, मकबरे और बगीचों के साथ प्रतिभाशाली भारतीय कलाओं को काफी बढ़ाया था। भारत में बाबर, हुमायूँ, अकबर और जहांगीर जैसे मुगल शासक देश मे सांस्कृतिक विकास का प्रसार करने के लिए जाने जाते थे। इस क्षेत्र मे अधिक से अधिक कार्य मुगल शासन के दौरान किया गया था। मुगल शासक संस्कृति के शौकीन थे; इसलिए सभी शासक शिक्षा के प्रसार के समर्थन मे थे। मुगल परम्पराओ ने कई क्षेत्रीय और स्थानीय राज्यो की महलों एवं किलों को अत्यधिक प्रभावित किया। मुगल राजवंश के लगभग सभी शासक महान निर्माता थे और उन्होंने भारत में शानदार स्मारकों का निर्माण किया है, जो न केवल भारत से बल्कि दुनिया भर के विभिन्न स्थानों से पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मुगल सम्राटों ने किले बागों का निर्माण किया था जो आज भी भवनों की सुंदरता को बढ़ाते हैं। मुगल शासकों ने ना केवल अपनी समाधि स्थल, भवन निर्माण किए बल्कि अपने पूर्ववर्जों के विपरीत, अकबर ने नदी के किनारे बगीचे का निर्माण किया जो मुगल गार्डन वास्तुकला के रुप में आज भी स्थापित है।

भारत में सर्वप्रथम बाबर ने कदम रखा था।  वह एक महान विद्वान था उसने अपने साम्राज्य मे स्कूलों और कलेजों के निर्माण की ज़िम्मेदारी ली थी । इसे उद्यानों से बहुत प्यार था; इसलिए उसने आगरा और लाहौर के क्षेत्र मे कई उद्यानों का निर्माण करवाया। कश्मीर मे निशल बाग़, लाहौर मे शालीमार एवं पंजाब मे पिंजौर उद्यान बाबर के शासन काल के दौरान विकसित किए गए उद्यानों के कुछ उदाहरण थे और ये उद्यान वर्तमान मे अब भी उपस्थित है। बाबर के बाद उसके बेटे हुमायूँ का आगमन हुआ जिसे  सितारों और प्राकृतिक विशेषताओं से संबन्धित विषयों की किताबों से अत्यधिक प्रेम था; इसने दिल्ली के समीप कई मदरसों का भी निर्माण करवाया, ताकि लोग वहाँ जाये और सीखे । मुगल काल के सबसे महान और प्रभावी शासक हुमायुं का बेटा अकबर ने जिसके बनाए हुए कई स्थल आज भारत का गौरव बढ़ा रहें हैं।  अकबर क्रियाशीलता केवल वास्तुकला की परमोत्कृष्ट कृतियों तक ही सीमित नहीं थी बल्कि उसने कुछ दुर्ग, ग्राम्य गृह, मीनारें, सराय, स्कूल, तालाब एवं कुएँ भी बनवाये अकबर ने आगरा और फतेहपुर सीकरी मे उच्च शिक्षा के लिए बड़ी संख्या मे स्कूलों और कॉलेजो का निर्माण किया, वह चाहता था कि उसके साम्राज्य का प्रत्येक व्यक्ति शिक्षा प्राप्त कर सके। अकबर प्रथम मुगल शासक था जिसके शासन काल मे विशाल पैमाने पर निर्माण कार्य किया गया। उसके निर्माण कि श्रेणी मे आगरा का सबसे प्रसिद्ध किला और विशाल लाल किला जिसमे कई भव्य द्वार है, शामिल है। हिन्दुओं के प्रति उसकी सहनशीलता, उनकी संस्कृति से सहानुभूति तथा उन्हें अपने पक्ष में करने की नीति के कारण उसने अपने बहुत-से भवनों में वास्तुकला की हिन्दू शैलियों का व्यवहार किया। इन भवनों की सजावट की विशेषताएँ हिन्दू तथा जैन मंदिरों में पायी जाने वाली सजावट की विशेषताओं की अनुकृतियाँ हैं। उसके शासन काल के दौरान मुगल वास्तुकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँची थी और पूरे भवन मे संगमरमर लगाना और दीवारों को फूल की आकृति के अर्ध कीमती पत्थरो से सजाने की प्रथा प्रसिद्ध हो गयी। सजावट का यह तरीका पेट्राड्यूरा कहा जाता है, जो शाहजहाँ के सानिध्य मे अधिक लोकप्रिय हुआ, ताजमहल के निर्माण के समय उसने इसका बड़े पैमाने पर प्रयोग किया, जिसे निर्माण कला के गहना के रूप मे माना गया।

अकबर के बाद उसके बेटे जहांगीर ने भी कई इमारतो का निर्माण कराया उसने तूज़ुक-ए-जहांगीरी नाम की किताब भी लिखी। जहाँगीर के शासनकाल में, उसके पिता के वास्तुकला-विषयक कार्य को ध्यान में रखते हुए, बहुत कम इमारतें बनीं किन्तु उसके समय की दो इमारतें विशेष आकर्षण की हैं। एक है अकबर का मकबरा, जिसकी खास विशेषताओं की चर्चा पहले की जा चुकी है। दूसरी है आगरे में इतिमादुद्दौला की कब्रें, जिसे उसकी पुत्री तथा जहाँगीर की बेगम नूरजहाँ ने बनवाया। यह कब्र बिलकुल उजले संगमरमर की बनी हुई थी तथा संगमरमर में जडित कम मूल्य वाले पत्थरों से सजी हुई थी। जहांगीर का बेटा शाहजहां एक महान निर्माता था। उसने अपनी प्रिय पत्नी मुमताजमहल की कब्र पर शानदार मकबरा ताजमहल बनवाया जिसके निर्माण में उस समय 50 लाख रुपए लगे थे। आज भी ताजमहल को सात अजूबों में से एक माना जाता है। ताजमहल अपनी सुंदरता के लिए विश्व विख्यात है।  हुमायूँ के मकबरे पर एक विशालकाय संगमरमर का गुंबद था जिसे अकबर के शासन काल प्रारम्भ होने के शुरुआत मे दिल्ली मे बनवाया गया था और इसे ताज महल के पूर्वज के रूप मे माना जा सकता है। दोहरा गुंबद इस भवन की एक अन्य विशेषता थी। जहाँगीर का मकबरा, जिसे शाहजहाँ ने आरम्भ में ही लाहौर में शाहदरा नामक स्थान में बनवाया था, यद्यपि ताज के समान प्रसिद्ध नहीं है, तथापि कला का एक सुन्दर नमूना है। शाहजहां के बाद उसका बेटा औरंगजेब जो बहुत ही क्रूर और लालची शासक था उसने अपने पिता शाहजहां को भी कैदी बना लिया था। उसने कोई भी भवन निर्माण नहीं किया।  उसके राज्यकाल की जो कुछ भी इमारतें हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण थी लाहौर मस्जिद, जो 1674 ई। में पूरी हुई थी, वे पुराने आदशों की कमजोर नकल मात्र है।
इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको मुगलकालिन वास्तुकला के बारे में बता रहे हैं जो आज भी पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।



ताज महल

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

दुनिया के सात अजूबों में से एक प्यार की निशानी ताजमहल ना केवल भारत का गौरव है बल्कि मुगलकालिन शासन की वास्तुकला का एक अद्भुद साक्षी भी है। सफेद संगमरमर का मकबरा, ताजमहल शाहजहां द्वारा मुगल राजवंश के उत्थान के दौरान अपनी पसंदीदा पत्नी मुमताज महल की मकबरे के लिए बनाया गया था। शाहजहां ने अपनी प्यारी पत्नी मुमताज महल के प्यार और सुंदरता को समर्पित करने और उसका नाम अमर बनाने के लिए इस अद्भुत स्मारक का निर्माण करवाया था। जिसके कारण इस मकबरे को प्यार का प्रतीक माना जाता है। ताजमहल शाहजहां की तीसरी बेगम मुमताज महल की मज़ार है। मुमताज के गुज़र जाने के बाद उनकी याद में शाहजहां ने ताजमहल बनवाया था। कहा जाता है कि मुमताज़ महल ने मरते वक्त मकबरा बनाए जाने की ख्वाहिश जताई थी जसके बाद शाहजहां ने ताजमहन बनावाया। कहा जाता है कि बुखारा शहर से कारीगर को बुलवाया गया था, वह संगमरमर के पत्थर पर फूलों को तराशने में दक्ष था। वहीं गुंबदों का निर्माण करने के लिए तुर्की के इस्तम्बुल में रहने वाले दक्ष कारीगर को बुलाया गया और मिनारों का निर्माण करने के लिए समरकंद से दक्ष कारीगर को बुलवाया गया था। और इस तरह अलग-अलग जगह से आए करीगरों ने ताजमहल बनाया था।  ई। 1630 में शुरू हुआ ताजमहल के बनने के काम करीब 22 साल तक चला। इसे बनाने में करीब 20 हजार मजदूरों ने योगदान दिया।

यह स्मारक यमुना नदी के दाहिने किनारे पर स्थित है जो जहां से यह पूर्व की तरफ बहती है। यह 42 एकड़ में फैला हुआ है। ताजमहल को सफेद संगमरमर से बनवाया गया है। इसके चार कोनों में चार मीनारे हैं। शाहजहां ने इस अद्भूत चीज़ को बनवाने के लिए बगदाद और तुर्की से कारीगर बुलवाए थे। माना जाता है कि ताजमहल बनाने के लिए बगदाद से एक कारीगर बुलवाया गया जो पत्थर पर घुमावदार अक्षरों को तराश सकता था।  ताजमनहल के  उत्तर से दक्षिण में इलाके में ढलान है। ताजमहल की सुंदरता ताजमहल उद्यान द्वारा कई गुना बढ़ी है जो पवित्र कुरान में वर्णित स्वर्ग उद्यान की तरह है। बाग मुख्य द्वार के अंत से शुरू होता है और 300 मीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह मकबरे के पास समाप्त होता है। बगीचे के पास फव्वारे के साथ दो संगमरमर के नहर बगीचे के केंद्र को पार करते हैं जो16 फूलों के पत्ते होते हैं यह पत्थर से बने मार्गों से विभाजित हैं।  यमुना नदी के किनारे सफेद पत्थरों से निर्मित अलौकिक सुंदरता की तस्वीर 'ताजमहल' आज ना केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। प्यार की इस निशानी को देखने के लिए दूर देशों से हजारों सैलानी यहां आते हैं।



कुतुब मीनार

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

कुतुब मीनार देश की राजधानी दिल्ली में स्थित है। जिसका निर्माण 1192 में कुतुब-उद-दीन एबाक ने शुरु कराया था। जिसके बाद उसके उत्तराधिकारी इल्तुतमिश और फिरोज शाह तुगलक ने इसका निर्माण पूरा किया। कुतुब मीनार विश्व धरोहर स्थल है। हालांकि कुतुब मिनार को मुगलों ने नहीं बनाया था किन्तु फिर भी यह उस समय की अद्भुद वास्तुकला का साक्षी है। क़ुतुब-उद-दिन ऐबक उस समय दिल्ली सल्तनत के संस्थापक थे। कुतुब मीनार को पूरा करने के लिये उत्तराधिकारी ऐबक ने उसमे तीन और मीनारे बनवायी थी। कुतुब मीनार के नाम को दिल्ली के सल्तनत कुतुब-उद-दिन ऐबक के नाम पर रखा गया है, और इसे बनाने वाला बख्तियार काकी एक सूफी संत था। कहा जाता है की कुतुब मीनार का आर्किटेक्चर तुर्की के आने से पहले भारत में ही बनाया गया था। लेकिन कथित तथ्यों के अनुसार इसे राजपूत मीनारों से प्रेरीत होकर बनाया गया था। पारसी-अरेबिक और नागरी भाषाओ में भी हमें क़ुतुब मीनार के इतिहास के कुछ अंश दिखाई देते है। क़ुतुब मीनार के सम्बन्ध में जो भी इतिहासिक जानकारी उपलब्ध है वो फ़िरोज़ शाह तुगलक (1351-89) और सिकंदर लोदी (1489-1517) से मिली है। कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद भी कुतुब मीनार के उत्तर में ही स्थापित है, जिसे क़ुतुब-उद-दिन ऐबक ने 1192 में बनवाया था। भारतीय उपमहाद्वीप की यह काफी प्राचीन मस्जिद मानी जाती है। लेकिन बाद में कुछ समय बाद इल्तुमिश (1210-35) और अला-उद-दिन ख़िलजी ने मस्जिद का विकास किया । यह महान मीनार 72।5 मीटर ऊंची है और बेस उपाय 14।32 मीटर और शीर्ष संरचना 2।75 मीटर है। कुतुब मीनार में लौह स्तंभ कई पर्यटकों को आकर्षित करता है। ऐसा माना जाता है कि अगर कोई खंभे पर अपनी पीठ के साथ खड़ा होता है और उसे अपनी बांह से लेता है तो उसकी इच्छाएं पूरी हो जाती है। । यह स्मारक भारत-इस्लामी मुगल वास्तुकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है और दिल्ली में प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है।



जामा मस्जिद

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

जामा मस्जिद दिल्ली में स्थित एक और वास्तुकला का उदाहरण है। जामा मस्जिद को भारत की सबसे बड़ी मस्जिद के रुप में भी जाना जाता है। जिसे मुगल सम्राट शाहजहां ने 1656 ईस्वी में बनाया था। इतिहासकारों का का कहना है कि 5,000 कारीगरों ने शाहजहाबाद में पहाड़ी भोज़ाल पर मस्जिद-ए-जहान नूमा या जामा मस्जिद का निर्माण किया था। यहाँ के प्रांगण में 25,000 लोग एक साथ अपनी नमाज़ अदा कर सकते हैं। पुरानी दिल्ली में इस मस्जिद की वास्तुकला में दोनों हिंदू और इस्लामी शैलियों का प्रदर्शन किया गया था, जो कि आगरा में लाल किले में मोती मस्जिद को दोहराने के लिए बनाया गया था। पौराणिक कथा यह भी कहती है कि मस्जिद की दीवारें एक निश्चित कोण पर झुकी हुयी थी ताकि अगर भूकंप आए, तो दीवारें बाहर की ओर गिरेंगी।

यह मस्जिद लाल किले के सामने सड़क पर स्थित है। शाहजहां के शासनकाल के दौरान यह मस्जिद अंतिम वास्तुकला का काम माना जाता है। लगभग 5000 कारीगरों ने लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर के साथ मस्जिद का निर्माण किया। जामा मस्जिद में चार टावर, दो मीनार और तीन प्रवेश द्वार हैं। मस्जिद में विस्तृत नक्काशी है और पवित्र कुरान दीवार पर लिखी गई है। मस्जिद में कई चीजों का संग्रह भी है जैसे कि पवित्र कुरान, मोहम्मद के अवशेष, पैगंबर के लाल भालू-बाल, उनके पैरों के निशान एक संगमरमर ब्लॉक में लगाए गए हैं। इस मस्जिद को बनाने में 6 साल का समय और करीब 10 लाख रुपये लगे।  जामा मस्जिद में प्रवेश करने के लिए उत्तर और दक्षिण द्वारों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जबकि पूर्वी द्वार सिर्फ शुक्रवार को ही खुलता है। इस द्वार के बारे में प्रचलित है कि सुल्तान इसी द्वार के ज़रिए जामा मस्जिद में प्रवेश करते थे। जामा मस्जिद में 11 मेहराब हैं। बीच वाला मेहराब सबसे बड़ा है, जिसके ऊपर सफेद और काले संगमरमर से सजे गुंबद बने हैं।  प्रतिदिन सैकेंडों लोग जामा मस्जिद में नमाज अदा करने और इसे देखने आते हैं।



लाल किला

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

देश की राजधानी दिल्ली में स्थित लाल किला ना केवल भारत की शान है बल्कि यह मुगलाकालिन वास्तुकला का अद्भुद नमूना भी है। ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण लाल किले का निर्माण शाहजहां ने करवाया था। लाल रंग के बलूआ पत्थर से बने होने के कारण इसका नाम लाल किला पड़ा। इसके अंदर मौजूद दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, रंग महल, खास महल, हमाम, नौबतखाना, हीरा महल और शाही बुर्ज यादगार इमारतें हैं।  सम्राट शाहजहां के शासनकाल के दौरान लाल किला मुगल राजवंश की राजधानी के रूप में कार्य करता था। किले ने लाल पत्थर की 33 मीटर ऊंची विशाल दीवारों से अपना नाम ग्रहण किया है। 1639 में, जब मुगल शासक शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली को स्थानांतरित किया, लाल किला का निर्माण उनके द्वारा नव स्थापित शहर शाहजहांबाद के उत्तर-पूर्वी हिस्से में आदेश दिया गया था। वर्तमान समय में शाहजहांबाद पुरानी दिल्ली के रूप में जाना जाता है निर्माण पूरा करने के लिए लगभग एक दशक लग गया, और किले के चारों ओर निर्मित खाई को खिलाने के लिए यमुना पानी का उपयोग किया गया।

बड़े पैमाने पर लाल रंग के बलुआ पत्थर द्वारा लाल किला का निर्माण ने इसे लाल किला का नाम दिया। लाल किले के दो द्वार हैं जैसे कि लाहौरी गेट और दिल्ली गेट। सम्राट शाहजहां दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास में आम लोगों की शिकायतें सुनते थे क्योंकि यह नाम उनके निजी मेहमानों के लिए था। रंग महल को पत्नियों और सम्राट की मालकिनों का महल माना जाता था। रंग महल का मुख्य आकर्षण एक कमल के आकार का फव्वारा है जो एक संगमरमर से बना है। लाल किले के अन्य आकर्षण मोती मस्जिद या पर्ल मस्जिद हैं। समीर शाहजहां के निजी कार्यकारी क्षेत्र शाही बुर्ज और शाही स्नान है।। लाल किला अब मुगल राजवंश की भव्यता और समृद्धि के अनुस्मारक के रूप में खड़ा है। लाल किले के निर्माण में करीब 10 साल का वक्त लगा। इसका निर्माण 1638 से 1648 के बीच हुआ और तब उसका नाम किला-ए-मुबारक था। लाल पत्थर से बने इस किले का आज भी कितना अधिक महत्व है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर साल 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से ही देश को संबोधित करते हैं।



एत्माद-उद-दौला

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

एत्माद-उद-दौला आगरा के पुराने शहर में स्थित है। एत्माद-उद-दौला भारत में पहला संगमरमर से बना मकबरा है। यह मकबरा मीर गियास बेग का है, जो मुगल शंहशाह जहांगीर की अदालत के वजीर थे। जहांगीर ने अपने ससुर घियास बेगको 'राज्य के स्तंभ' का खिताब दिया था। सम्राट जहांगीर घियास बेग की खूबसूरत बेटी नूरजहां से प्यार करते थे और उससे विवाह करना चाहते थे। नूरजहाँ ने अपने पिता के मकबरे का निर्माण उनकी मृत्यु के लगभग 7 वर्ष बाद 1628 ई। में पूरा करवाया। यह मकबरा चारबाग प्रणाली के एक बाग के मध्य बना है जो चारों ओर से ऊँची दीवारों से घिरा हुआ खड़ा है। एक उठी हुई बलुआ-पत्थर के चबूतरे पर खडा यह मकबरा श्वेत संगमरमर का बना हुआ है। इस स्मारक में एक समांतर चतुभुर्जीय केन्द्रीय कक्ष है जिसमें वजीर तथा उनकी बेगम-अस्मत बेगम की कब्र है। इस कक्ष के चारों तरफ छोटे-छोटे प्रकोष्ट हैं जिसमें नूरजहाँ तथा उनके पहले पति शेर अफगान से उत्पन्न पुत्री-लाडली बेगम तथा परिवार के अन्य सदस्यों की कब्रे है। बलुआ पत्थर की एक सीढी प्रथम तल पर जाती है, जहाँ केन्द्रीय कक्ष के ऊपर के मण्डप में एक भव्य आयताकार गुम्बद है जिसके ऊपर दो कलश है। यह मण्डप बिना किसी उत्कीर्ण के सादे संगमरमर की झँझरी है। इस भवन के ऊपरी चारों कोनों पर लगभग 40 फीट ऊँची चार गोल मीनारें हैं जिसके ऊपर संगमरमर की छतरियां है। इस इंडो-इस्लामी स्मारक को आभूषण बॉक्स के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि यह आकाश से देखने पर बगीचे में एक आभूषण के डिब्बे की तरह दिखता है।

एत्माद-उद्-दौला का मकबरा, इसके संपूर्ण सतह पर अत्यधिक बहुरंगी अलंकरण तथा नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। अलंकरण योजना में गुलदस्ता, गुलाब-जल के कलश, अंगूर, शराब की प्याली एवं बोतल का स्वतंत्र रूप से प्रयोग किया गया है। पुष्प संबंधी प्रमुख तत्वों का चित्रण अधिकांशतः मर्तबान के आकार के गुलदस्तों में चित्रकारी के रूप में है। यह अत्यंत रूचि का विषय है कि चित्रित खंडों की योजना में मानवाकृति भी बनायी गई है। इस मकबरे का मुख्य द्वार पूर्वी भाग में है जबकि उत्ती तथा दक्षिणी भाग में अलंकृत (छद्म) प्रवेशद्वारों का निर्माण कराया गया है। पश्चिमी भाग के मध्य में एक बहुमंजिला एवं अनेक कमरों की सुसज्जित इमारत है जो यमुना के ऊपर लटकी है। बाग तथा मकबरे के चारों तरफ एक छिछली नाली बहती है जिसमें मूलतः नदी किनारे स्थित दो कंडों से पानी भरा जाता था। इस मकबरे को देखने दूर-दूर से पर्यटक आते हैं।



हुमायूं का मकबरा

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

हुमायूं का मकबरा दिल्ली में स्थित है, यह भारत में मुगल वास्तुकला का पहला उदाहरण है। 1565 में, हुमायूं की विधवा, हामिदा बानू बेगम ने नौ साल बाद अपने मृत पति के लिए मकबरे का निर्माण किया। हुमायूं मकबरे का मुगल उद्यान चार हिस्सों में पैदल चलने वाले या बहने वाले पानी से विभाजित है। मुगल उद्यान पवित्र कुरान में वर्णित स्वर्ग उद्यान के विचार से बनाया गया है। ऐसा माना जाता है कि हुमायूं के मकबरे के निर्माण ने बहुत प्रसिद्ध ताजमहल के निर्माण को प्रेरित किया। यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया है। हुमायूं की मौत 1556 में हुई और हाजी बेगम के नाम से जानी जाने वाली उनकी विधवा, हमीदा बानू बेगम ने मृत्युे के 9 साल बाद इस मकबरे का निर्माण शुरू करवाया जो 1572 में पूरा हुआ। हुमायूं ने फारसी स्थापत्य कला के सिद्धांतो का ज्ञान प्राप्त किया था और शायद स्वयं ही इस मकबरे की योजना बनाई थी। इस मकबरे का निर्माण 15 लाख रूपए (1।5 मिलियन) की लागत से हुआ था। एक फारसी वास्तुएकार, मिराक मिर्जा गियासबेग को इस मकबरे के लिए हाजी बेगम ने नियुक्त किया था। यह मकबरा एक वर्गाकार उद्यान के केंद्र में है और चार बाग मुख्य भागों में विभाजित है, जिसके केंद्र में छोटे तालाब भी हैं। लाल बलुआ पत्थर से बना हुआ है और इस मकबरे की खांचेदार कोनों वाली दो मंजिला संरचना, 7 मीटर ऊंचे वर्गाकार चबूतरे पर खड़ी है। हुमाय़ुं की कब्र इस परिसर के बीच में है। मुगल वंश के अनेक शासक यहां दफन हैं। आखिरी मुगल शासक, बहादुरशाह जफर ने अपने तीन शहजादों के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई।) के दौरान इस मकबरे में शरण ली थी। यह मकबरा फारसी वास्तु  कला औऱ भारतीय परंपराओं का मिश्रण है।  मुगल वंश के अनेक शासक यहां दफन हैं। आखिरी मुगल शासक, बहादुरशाह जफर ने अपने तीन शहजादों के साथ प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857 ई।) के दौरान इस मकबरे में शरण ली थी। हुमायुं के मकबरे को देखने देश के साथ-साथ विदेशी पर्यटको का जमावड़ा यहां लगा रहता हैं। यह बनाते समय उसमे लाल पत्थरो का उपयोग किये जाने वाला यह पहला मकबरा है।1993 में इस मकबरे को यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया था और तभी से यह मकबरा पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। हुमायूँ के इस मकबरे के अन्दर बहोत से छोटे-छोटे स्मारक भी बने हुए है, जैसे ही हम मकबरे के दक्षिणी द्वार में प्रवेश करते है वैसे ही हमें रास्ते में बने छोटे-छोटे स्मारक दिखाई देते है।था
 (1531), चौसा का युद्ध (1539), बिलग्राम (1540) और सरहिंद का युद्ध (1555) में लड़ा गया था।



बुलंद दरवाजा

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

बुलन्द दरवाजा फतेहपुर सिकरी में है, जो आगरा से 43 किलोमीटर दूर है। फतेहपुर सिकरी महल का यह मुख्य प्रवेश द्वार भी है। दुनिया का सबसे ऊँचा और सबसे विशाल दरवाजा माने जाने वाले बुलंद दरवाजे का निर्माण मुग़ल सम्राट अकबर ने 1576 में गुजरात साम्राज्य पर मिली अपनी जीत की ख़ुशी में बनवाया था। 1601 ईस्वी में, मुगल सम्राट अकबर ने गुजरात पर अपनी जीत का मुकाबला करने के लिए फतेहपुर सीकरी में बुलंद दरवाजा का निर्माण किया। बुलंद दरवाजा 53।63 मीटर ऊंचा और 35 मीटर चौड़ा है। यह पवित्र कुरान से नक्काशीदार छंदों के साथ अलग मुगल वास्तुकला में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से बना है। पवित्र कुरान का शिलालेख अकबर की धार्मिक व्यापक दिमागीता का प्रतीक है। बुलंद दरवाज़े पर बना पारसी शिलालेख अकबर के खुले विचारों को दर्शाता है और इतिहासकारों द्वारा अकसर ही यह विविध परंपराओं और संस्कृति के उदाहरण के रूप में उपयोग किया जाता है। विस्तृत, ठोस बलुआ पत्थर की यह संरचना सभी ओर से एक बड़ी कब्र के बुद्धि दरवाज़े जैसी प्रतीत होती है। शांतिपूर्ण दृश्यों का अनुभव करने और दीवारों पर बनी सुंदर कलाओं का अध्ययन करने के लिए कई आंगतुक यहाँ आते हैं। बुलंद दरवाज़ा लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है जिसके अंदरूनी हिस्सों में सफेद और काले संगमरमर की नक्काशी है। सममित योजना और मुंडेर शैली में बनी इस संरचना के ऊपर खंभे और छतरियाँ बनी हैं।  लाल पत्थरों से बने इस दरवाजे का उपयोग फतेहपुर सिकरी के दक्षिण-पूर्वी प्रवेश द्वार पर किसी समय गार्ड के खड़े रहने के लिए किया जाता था। इसी विशाल दरवाजे के निचे जामा मस्जिद भी ढँकी हुई है, जो बुलंद दरवाजे की दायी तरफ स्थित है। पर्यटकों को यह जगह बहुत आकर्षित करती है।



आगरा किला

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

आगरा का किला भारत के उत्तरप्रदेश के आगरा शहर में स्थित है। यह एक  यूनेस्को  द्वारा घोषित  विश्व धरोहर स्थल है। यह किला प्रसिद्ध ताजमहल से 2।5 किमी उत्तर-पश्चिम में स्थित है। आगरा किला ताजमहल की बहन स्मारक कहा जाता है। स्मारक अकबर द्वारा बनाया गया था और यह मोती मस्जिद जैसी कुछ महत्वपूर्ण इमारतों का घर है। यहां मीना बाजार और जहांगीर महल, जो जहांगीर और उनके परिवार के लिए बनाया गया था। वो भी स्थित है।  किले को एक दीवार वाले विशाल राजसी शहर के रूप में भी वर्णित किया गया है। आगरा का किला अकबर द्वारा लाल बलुआ पत्थर से बनाया गया था। 1654 में सत्ता में प्रवेश के बाद उन्होंने अपने राज्य के एकीकरण के माध्यम से इसका निर्माण किया गया था, आगरा का किला एक सैन्य रणनीतिक बिंदु और शाही निवास दोनों के रूप में काम आता था। किले के प्रवेश द्वार पर एक तख्ती है, जिसपर लिखा है कि इस किले का निर्माण मूल रूप से 1000 इस्वी से भी पहले किया गया था और अकबर ने सिर्फ इसका नवीनीकरण करवाया था। बाद में शाहजहां ने इसे और उन्नत बनाया। उन्होंने संगमरमर और खूबसूरत नक्काशी से इसे और भी दर्शनीय बना दिया। इस किले को अर्धचन्द्राकार आकृति में बनाया गया है और यह यमुना नदी के सामने स्थित है। इसमें परकोटे हैं, जिनके बीच भारी बुर्ज बराबर अंतराल है।  जब बाबर ने 1526 में पानीपत में इब्राहिम लोदी को पराजित किया और मार डाला, तब आगरा मुगल साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण स्थान था। यह एक खंडहर हालत में था और तब अकबर ने इसे अपनी राजधानी बनाने का फैसला किया और 1558 में आगरा पहुंचे अकबर ने इसे लाल बलुआ पत्थर से पुनः बनवाया था। अपने जीवन के अंतिम दिनों में, शाहजहाँ के पुत्र औरंगजेब ने इसी किले में उन्हें बंदी बना लिया था,। यह भी कहा जाता है कि शाहजहाँ की मृत्यु, किले के मुसम्मान बुर्ज में ताज को देखते हुए हुई थी, इस बुर्ज के झरोंखे से ताजमहल का दृश्य साफ़ दिखाई देता है। आगरा का किला पूरे देश के साथ विदेश में भी प्रसिद्ध है।



अकबर का मकबरा

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

अकबर महान का मकबरा। सिकंदरा स्थित यह मकबरा 119 एकड़ में फैला हुआ है। सिकंदरा के आगरा किले से 13 किमी दूर स्थित है, जो मथुरा रोड पर शहर के केंद्र के 8 किमी पश्चिम-उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह मकबरा इमारत एक छोटा सा पिरामिड आकार का पांच मंजिला स्मारक है जो गहरे लाल बलुआ पत्थर से बना है और सफेद संगमरमर में सुविधाओं के साथ समृद्ध है। अकबर ने अपनी मकबरे के लिए स्वंय स्थल का का चयन किया और सिकंदरा के निर्माण की शुरुआत की थी। बाद में इसका निर्माण उनके बेटे जहांगीर द्वारा पूरा किया गया था। मकबरे से करीब 1 किमी दूर सम्राट अकबर की पत्नी और जहांगीर की मां मरियम-उज़-ज़मानी का मकबरा है। अकबर के मकबरे का निर्माण संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से किया गया है और इसमें मुस्लिम और हिन्दू वास्तुशिल्प शैली का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। इसमें प्रयुक्त संगमरमर में खूबसूरत नक्काशी की गई है और इसे आभूषणों से सजाया गया है। मकबरा 105 स्क्वायर मीटर के क्षेत्र पर बना है और निर्माण में परिशुद्धता के लिए कम्पास का सहारा लिया गया था। यह ऊंची दीवारों से घिरे मनमोहक बाग के बीच में स्थित है।  इस मकबरे की खासियत इसका दरवाजा है, जिसे बुलंद दरवाजा कहा जाता है। दरवाजे से शुरू होकर एक चौड़ा रास्ता मकबरे तक जाता है।  यह दरवाजा एक मेहराब पर बना हुआ है और इसमें संगमरमर से बनी चार मीनारें हैं। देखा जाए तो मकबरे से ज्यादा इसका दरवाजा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।  मकबरे के शेष भाग का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है जिसमे मुग़ल वास्तुकला का उपयोग किया गया है। अकबर का मकबरा एक पांच मंजिला इमारत है और पिरामिड आकार का है। मकबरे की सबसे ऊपरी मंजिल पर बना मकबरा वास्तविक नहीं है क्योकि मूल कब्र को ज़मीन स्तर के नीचे बनाया गया है। सबसे नीचे की मंजिल के चारो तरफ एक मठ बनाया गया है जिसे कई हिस्सों में विभाजित किया गया है जिसमे विशाल मेहराबों और स्तम्भों के खण्ड है। मकबरे की चारो मंजिलो में बरामदा है जिनमे मेहराबों के समूह है और प्रत्येक साइड पर तोरणपथ बनाए गए है। दूसरी मंजिल के कुछ पिरामिड आकार की छते है जिनका निर्माण संगमरमर द्वारा किया गया है जबकि शेष गुम्बंद आकार के है। तीसरी मंजिल के प्रत्येक कोने में एक छोटा वर्गाकार कमरा है।

इस इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल का निर्माण सफ़ेद संगमरमर द्वारा किया गया है। मकबरे में स्थित सभा कक्ष वर्गाकार का है, और आसमान की ओर से खुल है। मकबरे में एक केंद्रीय आँगन है जो चारो ओर से पतली मेहराबों से घिरा हुआ है। इस आँगन को खण्डों में विभाजित किया गया है जिसकी छतों पर पैटर्न का काम किया गया है। मकबरे परिसर के केंद्र में एक वर्ग मंच है जिसके ऊपर नकली कब्र बनायीं गयी है जिसका निर्माण सफ़ेद संगमरमर से किया गया है। इस कब्र पर अरेबिक और फूल पैटर्न का खुदाई का कार्य किया गया है। सभी इमारतों के केंद्र को मकबरे की ही तरह ऊंचा बनाया गया है जिनमे सुन्दर पैनल है जिनको पच्चीकारी के काम से सजाया गया है। जो देखने में बहुत आकर्षक है। अकबर के किले को देखने कई पर्यटक आते हैं और इसकी वास्तुकला को देख अचंभित हो जाते हैं।



फतेहपुर सीकरी

भारत में मुगलकालिन वास्तुकला

फतेहपुर सीकरी उत्तर प्रदेश के आगरा जिले का एक शहर है। मुगल सम्राट अकबर ने 1569 में इस शहर की स्थापना की थी और 1571 से 1585 तक मुगल साम्राज्य की राजधानी के रूप में इसे स्थापित किया था। अकबर ने शहर को फतेहबाद, फतेह का नाम अरबी में विजयी मान कर रखा। यह शहर खूबसूरत भारतीय मुगल वास्तुकला स्मारकों के खजाने के तख्ते के रूप में कार्य करता है। आगरा से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आज यह ऐतिहासिक शहर बन गया है। 1573 में यहीं से अकबर ने गुजरात को फतह करने के लिए कूच किया था।  गुजरात पर विजय पाकर लौटते समय उस ने सीकरी का नाम ‘फतेहपुर’ (विजय नगरी) रख दिया।  तब से यह स्थान फतेहपुर सीकरी कहलाता है। फतेहपुर सीकरी को किलाबंद शहर कह सकते हैं। बुलंद दरवाजा, बादशाही दरवाजा, पंच महल, जोधाबाई महल और बीरबल भवन सीकरी की चंद निशानियां हैं। दीवान-ए-खास, दीवान-ए-आम, अनूप तालाब और दौलत खाना भी देखते ही बनते हैं। सारा किला लाल पत्थरों से बना है। यहां खास अनूप तालाब है। यह एक छोटा-सा ताल है, जो छोटे-छोटे पुलों से जुड़ा है। यहीं तानसेन अपने संगीत से दरबार को मंत्रमुग्ध कर देते थे। इसी किले में एक छोटी-सी इमारत और है, नाम है-आंख मिचौली। कहते हैं कि यह अकबर की सबसे पसंदीदा जगह थी। यहीं वह अपनी बेगमों के संग खेल खेला करता था और किले में 175 फुट ऊंचे बुलंद दरवाजे से ही प्रवेश करते। कहा जाता है कि बुलंद दरवाजा एशिया का सबसे ऊंचा फाटक है।  यहां की इमारतों को दो तरह से देखा जा सकता है या तो आप नीचे से ऊपर की ओर बढ़ें या बुलंद दरवाजे से घुस कर ऊपर से नीचे आएं। बुलंद दरवाजे तक पहुंचने के लिए पत्थर की सीढ़ियों से 13 मीटर ऊपर आना होगा।  करीब पांच सौ सालों के बाद भी यह तरोताजा और नया-सा लगता है। यहां की जालियां बड़ी खूबसूरत हैं। इसी प्रांगण में एक बादशाह दरवाजा है, जिससे होकर बादशाह अकबर मस्जिद और दरगाह में प्रवेश करते थे। यह ठीक मस्जिद के सामने है। बादशाही दरवाजे के करीब पहुंचने पर नीचे जाती हुई सीढ़ियां दिखती हैं, जो उस शाही रिहायशी इलाके में पहुंचाती हैं, यहां सारे आवासीय भवन, मनोरंजन की सुविधाएं बनाई गईं। फतेहपुर सिकरी का आज एक धार्मिक महत्व भी है। पर्यटक दूर-दूर से इसे देखने और प्रार्थनाएं करने यहां आते हैं।


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